UP चुनाव 2027: वोटर लिस्ट से नाम काटने के 32 फॉर्म-7 पर विवाद! सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगी कार्रवाई रिपोर्ट, BLO के हस्ताक्षरों पर भी सवाल
उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान एक विधानसभा क्षेत्र से 32 फॉर्म-7 जमा होने और इनमें दो पर BLO के कथित हस्ताक्षर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने चुनाव आयोग को लंबित शिकायतों की जांच, जरूरी सुधार और कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
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UP SIR News: यूपी में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा करने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जांच और कार्रवाई रिपोर्ट मांगी। चुनाव आयोग ने कहा कि गलत पाए गए आवेदनों के आधार पर किसी मतदाता का नाम नहीं हटाया गया।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली/लखनऊ | 30 अक्टूबर 2026
खबर में खास
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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी में बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा होने की शिकायतों की जांच का निर्देश दिया।
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याचिकाकर्ताओं ने एक विधानसभा क्षेत्र में 32 फॉर्म-7 जमा होने का आरोप लगाया।
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दावा किया गया कि दो फॉर्म पर बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के हस्ताक्षर थे।
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चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि जाँच में गलत पाए गए आवेदनों के आधार पर नाम नहीं हटाए गए।
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अदालत ने लंबित शिकायतों का विवरण लेकर आवश्यक सुधार करने और अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा।
नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मतदाता सूची को लेकर चल रहा विवाद शुक्रवार, 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई तक पहुँचा। प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा कर मतदाताओं के नाम हटवाने की कथित कोशिशों पर अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग को जांच और आवश्यक सुधार करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता अनसुलझी शिकायतों का विवरण आयोग को उपलब्ध कराएँ। आयोग इनकी तथ्यात्मक जाँच करके आवश्यक कार्रवाई करे और अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेश करे।
एक विधानसभा में 32 फॉर्म-7, दो पर BLO के हस्ताक्षर का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश के एक विधानसभा क्षेत्र में एक विशेष समुदाय के मतदाताओं के नाम हटवाने के लिए 32 फॉर्म-7 जमा किए गए थे।
वकील के अनुसार, इनमें दो आवेदन ऐसे थे जिन पर बूथ लेवल अधिकारियों के हस्ताक्षर भी मौजूद थे।
याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग के हलफनामे में दी गई जानकारी पर सवाल उठाए और दावा किया कि आवेदन प्राप्त होने तथा उनकी जाँच से संबंधित विवरण में विसंगतियाँ हैं।
हालांकि, इन 32 आवेदनों के आधार पर मतदाताओं के नाम वास्तव में हटाए गए थे, इसकी पुष्टि अदालत की इस सुनवाई में नहीं हुई।
चुनाव आयोग ने कोर्ट में क्या जवाब दिया?
भारत निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू पेश हुए।
उन्होंने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा होने का मामला आयोग के संज्ञान में था। अधिकारियों ने संबंधित आवेदनों की जाँच और दोबारा सत्यापन किया था।
आयोग का पक्ष था कि शिकायत वाले आवेदन गलत पाए गए और उनके आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाने की कार्रवाई नहीं की गई।
नायडू ने यह भी कहा कि यदि उत्तर प्रदेश में किसी विशेष मामले की शिकायत औपचारिक रूप से दी जाती है, तो आयोग उसकी जाँच कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे अब तक अनसुलझी शिकायतों का लिखित विवरण चुनाव आयोग के अधिवक्ता को सौंपें।
इसके बाद आयोग को उन शिकायतों की तथ्यात्मक जाँच करनी होगी। जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ सुधारात्मक कदम उठाकर अदालत को अनुपालन रिपोर्ट देनी होगी।
यह निर्देश महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने शिकायतों का परीक्षण करने और उसके परिणाम की रिपोर्ट देने की प्रक्रिया निर्धारित की है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण पर सभी आरोपों को सही घोषित नहीं किया है और न ही किसी राजनीतिक दल या अधिकारी को दोषी ठहराया है।
कांग्रेस और सपा नेताओं से जुड़ा है मामला
इस न्यायिक कार्यवाही से जुड़ी याचिकाओं में कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और समाजवादी पार्टी नेता अरविंद कुमार सिंह का नाम शामिल है।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में शिकायतों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं होने से ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा मिला।
उन्होंने तेलंगाना और कर्नाटक के समान मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ शिकायतों के आधार पर FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि, ये याचिकाकर्ताओं की दलीलें थीं। उत्तर प्रदेश में किसी संगठित मतदाता-विलोपन अभियान का दोष अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है।
फॉर्म-7 क्या होता है और क्यों महत्वपूर्ण है?
फॉर्म-7 निर्वाचन आयोग की वह निर्धारित आवेदन प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई जा सकती है या नाम हटाने का अनुरोध किया जा सकता है।
किसी का नाम हटाने के लिए आवेदन जमा होना और उसका नाम वास्तव में मतदाता सूची से हट जाना अलग-अलग चरण हैं।
निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन की जाँच और निर्णय करना होता है।
इसलिए फॉर्म-7 के दुरुपयोग के आरोपों की जाँच चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों, दोनों से संबंधित है।
अब आगे क्या होगा?
अदालत के निर्देश के बाद अगला कदम याचिकाकर्ताओं की ओर से लंबित शिकायतों का विवरण उपलब्ध कराना है।
इसके बाद चुनाव आयोग संबंधित मामलों की जाँच करके बताएगा कि कौन-सी शिकायत सही पाई गई, किन आवेदनों में अनियमितता थी और कहाँ सुधारात्मक कार्रवाई आवश्यक है।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह प्रक्रिया राजनीतिक दलों और निर्वाचन प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रत्यक्षदर्शी का सवाल: यदि किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए गलत या फर्जी फॉर्म जमा किया जाए, तो क्या संबंधित आवेदनकर्ता और उसकी जाँच करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी सार्वजनिक होनी चाहिए?
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