दिल्ली SIR में 572 मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की आपत्तियाँ! BJP बूथ एजेंटों के नाम सामने, 28 लोग अपने ही घरों में मिले

दिल्ली के मुस्तफाबाद में मतदाता सूची से नाम हटवाने के लिए 843 आपत्तियाँ दर्ज होने की रिपोर्ट है। इनमें 572 आवेदन भाजपा के बूथ एजेंटों के नाम से मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ दर्ज बताए गए हैं। कई मतदाताओं ने नोटिस नहीं मिलने की शिकायत की।

Delhi SIR Controversy: मुस्तफाबाद में मतदाता सूची से नाम हटाने के 572 फॉर्म-7 को लेकर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 28 मतदाता अपने पते पर मौजूद मिले, जबकि उनके नाम हटाने के आवेदन दिए गए थे। जानिए चुनावी रिकॉर्ड की पड़ताल में क्या सामने आया।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 30 अक्टूबर 2026
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दिल्ली के मुस्तफाबाद में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए दाखिल फॉर्म-7 आवेदनों की पड़ताल में विसंगतियाँ सामने आने की रिपोर्ट।

खबर में खास

  • दिल्ली के मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र में 843 फॉर्म-7 आपत्तियाँ दर्ज होने की रिपोर्ट।
  • इनमें से 597 आवेदन तीसरे पक्षों द्वारा दिए गए।

  • 572 आवेदनों में भाजपा के बूथ-स्तरीय एजेंटों के नाम दर्ज बताए गए, सभी संबंधित आवेदन मुस्लिम मतदाताओं से जुड़े हैं।

  • दयालपुर के बूथ संख्या 129 के 28 मतदाता अपने दर्ज पते पर रहते मिले।

  • एक 76 वर्षीय जीवित मतदाता के नाम के खिलाफ मृत्यु के आधार पर आपत्ति दाखिल होने की रिपोर्ट।

  • आवेदन जमा होने का अर्थ मतदाता सूची से नाम हट जाना नहीं है।
नई दिल्ली। देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच दिल्ली के मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र से नया मामला सामने आया है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को प्रकाशित The Hindu की पड़ताल के मुताबिक, इस क्षेत्र में मतदाताओं के नाम हटवाने के लिए बड़ी संख्या में फॉर्म-7 दाखिल किए गए हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 572 आवेदनों में भाजपा के बूथ-स्तरीय एजेंटों के नाम दर्ज हैं। ये आवेदन मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन 28 मतदाताओं के नाम हटाने की आपत्तियाँ दर्ज हुई थीं, वे अपने पंजीकृत पते पर रह रहे थे।

20 साल से रह रहे परिवार के सदस्यों के नाम हटाने का आवेदन

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद स्थित दयालपुर में रहने वाले साजिद हुसैन पेशे से दर्जी हैं। वह करीब 20 वर्षों से एक ही पते पर रह रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, उनकी पत्नी अफसाना खातून और बेटे असद रजा जैदी के नाम मतदाता सूची से हटाने के आवेदन दिए गए।
इन आवेदनों में संबंधित मतदाताओं के अनुपस्थित होने, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने या मृत्यु जैसे कारण दर्ज थे।
साजिद हुसैन का कहना है कि उन्होंने आवेदन करने वाले व्यक्ति का नाम पहले कभी नहीं सुना था। उनके परिवार के सदस्य उसी पते पर रहते हैं।

बूथ संख्या 129 पर क्या सामने आया?

चुनावी रिकॉर्ड के आधार पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, दयालपुर के बूथ संख्या 129 पर कुल 28 नाम हटाने की आपत्तियाँ दर्ज थीं।
इन सभी आवेदनों में भाजपा के बूथ-स्तरीय एजेंट चंद्रशेखर नैनवाल का नाम दर्ज बताया गया है।
 संबंधित मतदाता अपने पतों पर मौजूद थे। इनमें से 19 मतदाताओं या उनके परिवार के सदस्यों से बातचीत भी की गई।
इन लोगों के पास पहचान से जुड़े दस्तावेज थे और उनके नाम 31 अगस्त को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में भी थे।

843 आपत्तियों में 572 का भाजपा एजेंटों से संबंध

रिपोर्ट में मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र के व्यापक रिकॉर्ड की भी पड़ताल की गई है।
31 अगस्त के बाद क्षेत्र में कुल 843 फॉर्म-7 आपत्तियाँ दर्ज बताई गई हैं। इनमें 597 आवेदन तीसरे पक्षों ने दिए थे।
इनमें से 572 आवेदनों में भाजपा के बूथ-स्तरीय एजेंटों के नाम दर्ज बताए गए हैं। ये आवेदन विधानसभा क्षेत्र के 24 अलग-अलग हिस्सों के मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित थे।
रिपोर्ट के अनुसार, कई एजेंटों के नाम से 30 से अधिक आवेदन दर्ज हुए। इससे आवेदन संख्या की सीमा और आवश्यक सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।

जिंदा व्यक्ति को मृत बताकर आवेदन?

रिपोर्ट में 76 वर्षीय जहीर अली का मामला भी सामने आया।
उनके नाम के खिलाफ मृत्यु के आधार पर आपत्ति दाखिल होने की बात कही गई, जबकि परिवार ने बताया कि वह जीवित हैं।
प्रभावित परिवारों ने यह भी कहा कि उन्हें नाम हटाने की आपत्तियों के संबंध में नोटिस नहीं मिले थे।
हालांकि, नोटिस न मिलने के दावे और आवेदन के रिकॉर्ड की औपचारिक जांच संबंधित निर्वाचन अधिकारियों को करनी होगी।

फॉर्म-7 और बूथ एजेंट में क्या अंतर है?

फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम पर आपत्ति दर्ज कराने या नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है।
BLO (Booth Level Officer) चुनाव प्रशासन से संबंधित अधिकारी या कर्मचारी होता है, जबकि BLA (Booth Level Agent) किसी राजनीतिक दल का नियुक्त बूथ प्रतिनिधि होता है।
दोनों की भूमिका अलग है। फॉर्म-7 दाखिल करने वाला व्यक्ति स्वयं किसी मतदाता का नाम अंतिम रूप से नहीं हटा सकता।
आवेदन मिलने के बाद निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच और निर्णय करना होता है।

भाजपा और चुनाव आयोग का क्या पक्ष है?

उपलब्ध रिपोर्ट में आवेदनों के रिकॉर्ड और प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों का विवरण है।
हालांकि, इस विशेष मामले में भाजपा के प्रदेश नेतृत्व या दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से सभी आरोपों पर विस्तृत अंतिम प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं मिली है।
रिकॉर्ड में आवेदनकर्ता के रूप में नाम दर्ज होना और उस व्यक्ति द्वारा जानबूझकर गलत आवेदन करने का दोष साबित होना भी अलग बातें हैं।
इसलिए फिलहाल इन मामलों को जांच योग्य आपत्तियों और रिपोर्ट की गई विसंगतियों के रूप में ही प्रस्तुत करना सही होगा।

अब किन सवालों का जवाब जरूरी है?

दिल्ली में SIR की प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने संबंधी आवेदनों की जांच जारी है।
मुस्तफाबाद के मामलों में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि जिन मतदाताओं के नाम के खिलाफ आपत्तियाँ दी गईं, उनकी जमीनी जांच हुई या नहीं, संबंधित लोगों को नोटिस भेजे गए या नहीं और किसी आवेदन को गलत पाए जाने पर क्या कार्रवाई की गई।
प्रत्यक्षदर्शी का सवाल: यदि किसी जीवित व्यक्ति को मृत बताकर मतदाता सूची से नाम हटाने का आवेदन दिया जाए, तो क्या चुनाव आयोग को ऐसी शिकायतों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए?

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