‘देश में UCC लागू करना संभव नहीं’, मौलाना सुफियान निजामी बोले- सरकार मुसलमानों की शिक्षा-रोजगार पर दे ध्यान
UCC पर जारी बहस के बीच मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि भारत में अलग-अलग समुदायों के अपने पर्सनल कानून हैं, इसलिए पूरे देश में UCC लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने सरकार से मुसलमानों की शिक्षा, रोजगार और विकास पर ध्यान देने की अपील की।
यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर देश में सियासी और धार्मिक बहस तेज हो गई है। मौलाना सुफियान निजामी ने UCC का विरोध करते हुए कहा कि भारत में अलग-अलग समुदायों के अपने पर्सनल कानून हैं और पूरे देश में इसे लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने सरकार से UCC के बजाय मुसलमानों की शिक्षा, रोजगार और विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करने को कहा। यह प्रतिक्रिया अमित शाह के 2029 से पहले NDA-शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने के ऐलान के बाद सामने आई है।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | लखनऊ | 15 सितंबर 2026
UCC पर जारी बहस के बीच मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि पूरे देश में इसे लागू करना संभव नहीं है। UCC पर जारी बहस के बीच मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि पूरे देश में इसे लागू करना संभव नहीं है।
खबर में खास
UCC के विरोध में सुफियान निजामी का बयान
कहा- देश में इसे लागू करना संभव नहीं
अलग-अलग पर्सनल लॉ का दिया तर्क
सरकार से मुस्लिम शिक्षा-रोजगार पर ध्यान देने की अपील
देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से 2029 से पहले NDA-शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने की बात कहे जाने के बाद अब मौलाना सुफियान निजामी ने इसका विरोध किया है।
उनका कहना है कि भारत में अलग-अलग समुदायों के अपने पर्सनल कानून हैं, इसलिए पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करना संभव नहीं है।
UCC पर क्या बोले सुफियान निजामी?
सुफियान निजामी ने UCC की जरूरत पर ही सवाल उठाया।
उनका तर्क है कि देश में अलग-अलग समुदाय अपने पर्सनल कानूनों के अनुसार विवाह, तलाक और विरासत जैसे निजी मामलों को देखते हैं।
इसी आधार पर उन्होंने कहा कि पूरे देश में UCC लागू करना संभव नहीं है और इसकी जरूरत भी नहीं है।
यह सुफियान निजामी का मत और तर्क है; इसे UCC की संवैधानिक या कानूनी असंभवता के स्थापित तथ्य के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।
‘मुसलमानों के विकास पर ध्यान दे सरकार’
सुफियान निजामी ने केंद्र सरकार को लेकर भी अपनी बात रखी।
उन्होंने कहा कि सरकार को UCC लागू करने के बजाय मुसलमानों के विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।
उनके मुताबिक समुदाय के लिए शिक्षा और रोजगार सहित दूसरे क्षेत्रों में तरक्की पर काम किया जाना चाहिए।
आखिर UCC है क्या?
Uniform Civil Code का सामान्य अर्थ नागरिकों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और विरासत जैसे नागरिक मामलों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह समान नियमों की व्यवस्था से है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने की बात कही गई है।
हालांकि UCC का स्वरूप और उसमें धार्मिक-जनजातीय परंपराओं के साथ व्यवहार कैसे होगा, इसे लेकर लंबे समय से राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक बहस चलती रही है।
अमित शाह के बयान के बाद तेज हुई बहस
मौजूदा विवाद का बड़ा कारण केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बयान है।
13 सितंबर को मुंबई में अमित शाह ने कहा कि 2029 से पहले BJP के नेतृत्व वाले NDA के सभी 21 राज्यों में UCC लागू हो जाएगा।
इसके बाद UCC को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला तेज हो गया।
यही वजह है कि सुफियान निजामी का ताजा बयान केवल धार्मिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि मौजूदा राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
समर्थक और विरोधी क्या कहते हैं?
UCC के समर्थकों का तर्क है कि नागरिक मामलों में धर्म से इतर समान नियम होने चाहिए और इससे कानूनी समानता मजबूत हो सकती है।
वहीं विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के कारण अलग-अलग समुदायों के पर्सनल कानूनों और परंपराओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
इसी दूसरे पक्ष को आगे रखते हुए सुफियान निजामी ने UCC का विरोध किया है।
CAA पर भी दिया बयान
सुफियान निजामी ने इस दौरान CAA पर भी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि CAA का पालन संविधान के मुताबिक होना चाहिए और इससे जुड़े तकनीकी पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए।
उनका कहना था कि अगर किसी बिंदु पर आपत्ति सामने आती है तो संबंधित कमेटी उसे सामने रखेगी।
UCC पर आगे और तेज होगी राजनीति?
2029 तक NDA-शासित राज्यों में UCC लागू करने की अमित शाह की घोषणा के बाद यह मुद्दा आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक विषय बन सकता है।
एक तरफ BJP इसे समान नागरिक कानून की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में पेश कर रही है, वहीं मुस्लिम संगठनों और विभिन्न विपक्षी नेताओं की तरफ से पर्सनल लॉ और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं।
सुफियान निजामी का ताजा बयान इसी बहस की नई कड़ी है।