सहारनपुर मस्जिद केस में हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: योगी सरकार से मांगा जवाब, ₹6.41 करोड़ की वसूली पर लगाई रोक
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद गिराए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने मस्जिद कमेटी से ₹6.41 करोड़ की क्षतिपूर्ति वसूलने पर अंतरिम रोक लगाते हुए अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को तय की है।
सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और प्रशासन से जवाब तलब किया है। अदालत ने मस्जिद कमेटी से 6.41 करोड़ रुपये की वसूली पर फिलहाल रोक लगा दी, लेकिन ध्वस्तीकरण की वैधता पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
प्रयागराज/सहारनपुर। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को ध्वस्त किए जाने का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से जवाब मांगा है। इसके साथ ही अदालत ने मस्जिद कमेटी से 6 करोड़ 41 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति वसूलने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने दिया। मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित की गई है। अब राज्य सरकार को अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए बताना होगा कि बेदखली, जुर्माना लगाने और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई किस कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई।
हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने अभी ध्वस्तीकरण को अवैध घोषित नहीं किया है। अदालत का वर्तमान आदेश मुख्य रूप से सरकार से जवाब मांगने और 6.41 करोड़ रुपये की वसूली पर अंतरिम रोक लगाने से जुड़ा है। मामले की वैधता पर अंतिम फैसला आगे की सुनवाई के बाद होगा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
मस्जिद कमेटी की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से जवाब मांगा। इसके साथ ही नगर मजिस्ट्रेट द्वारा मस्जिद कमेटी से 6.41 करोड़ रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में वसूलने के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी गई।
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने की और अगली तारीख 12 अक्टूबर तय की गई है।
मस्जिद कमेटी ने हाईकोर्ट में नगर मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई 2026 के आदेश और उसके खिलाफ अपील खारिज करने वाले जिला जज के 2 सितंबर के फैसले को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का दावा है कि संबंधित आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानून के विपरीत पारित किए गए।
क्या है सहारनपुर मस्जिद विवाद?
यह मामला सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की लगभग 315 वर्ग मीटर जमीन पर बने धार्मिक ढांचे से संबंधित है। प्रशासन का दावा है कि यह सरकारी जमीन थी और इस पर बिना वैधानिक अनुमति के कब्जा करके निर्माण किया गया था।
दूसरी तरफ मस्जिद कमेटी का कहना है कि यह मस्जिद सौ वर्ष से अधिक पुरानी थी और लंबे समय से यहां नमाज अदा की जा रही थी। कमेटी ने संपत्ति के वक्फ में दर्ज होने और पुराने दस्तावेज उपलब्ध होने का भी दावा किया है। इन दावों की कानूनी वैधता पर अब हाईकोर्ट में सुनवाई होगी।
मामले में मार्च 2025 के दौरान बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी की शिकायत के बाद प्रशासनिक कार्रवाई शुरू होने की जानकारी सामने आई थी। शिकायत में कलेक्ट्रेट परिसर की सरकारी जमीन पर कथित अवैध कब्जे का आरोप लगाया गया था।
16 जुलाई को आया था बेदखली का आदेश
नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत कार्रवाई करते हुए जमीन से बेदखली का आदेश पारित किया था। इसके साथ ही कथित अनधिकृत कब्जे को लेकर मस्जिद कमेटी पर 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति भी लगाई गई।
कमेटी ने इस आदेश के खिलाफ जिला जज की अदालत में अपील की। दो सितंबर को जिला अदालत ने अपील खारिज करते हुए नगर मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखा। इसके तीन दिन बाद प्रशासन ने परिसर में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में नगर मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश और जिला जज के 2 सितंबर के फैसले, दोनों को चुनौती दी गई है।
भारी पुलिस बल के बीच गिराई गई थी मस्जिद
प्रशासन ने पांच सितंबर की देर रात से छह सितंबर की सुबह के बीच कलेक्ट्रेट परिसर के मुख्य रास्तों को बंद कर भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।
प्रशासन का कहना था कि जिला अदालत से कमेटी की अपील खारिज होने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की गई। अधिकारियों के मुताबिक, विवादित ढांचा सरकारी जमीन पर बना था और संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे।
वहीं, मस्जिद कमेटी ने आरोप लगाया कि जिला अदालत के आदेश में सीधे तौर पर मस्जिद गिराने का निर्देश नहीं था। कमेटी का कहना है कि उसे हाईकोर्ट जाने के लिए पर्याप्त समय दिए बिना कार्रवाई कर दी गई।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जिला अदालत के 2 सितंबर के आदेश में अलग से ध्वस्तीकरण का निर्देश नहीं दिया गया था, बल्कि कमेटी की अपील खारिज करते हुए नगर मजिस्ट्रेट का आदेश बरकरार रखा गया था।
मस्जिद कमेटी ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?
अधिवक्ता मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इसमें दावा किया गया कि नगर मजिस्ट्रेट और जिला जज के आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं।
कमेटी ने ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि उसे उचित नोटिस और कानूनी उपाय अपनाने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। कमेटी ने 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति को भी अत्यधिक और मनमाना बताया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों पर फिलहाल कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगते हुए आर्थिक वसूली पर अंतरिम रोक लगाई है।
प्रशासन का क्या पक्ष है?
सहारनपुर प्रशासन का कहना है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से बनी थी। अधिकारियों के अनुसार, नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद बेदखली का आदेश दिया और जिला अदालत ने भी इस निर्णय के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी थी।
प्रशासन ने ध्वस्तीकरण के दौरान सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने का दावा किया है। अब इन दावों और प्रशासन के रिकॉर्ड की समीक्षा हाईकोर्ट करेगा।
क्या दोबारा बनाई जाएगी मस्जिद?
हाईकोर्ट के वर्तमान आदेश का अर्थ यह नहीं है कि मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश दे दिया गया है। अदालत ने अभी केवल राज्य सरकार से जवाब मांगा है और 6.41 करोड़ रुपये की वसूली पर अंतरिम रोक लगाई है।
मस्जिद को गिराने की कार्रवाई वैध थी या नहीं, कमेटी को पर्याप्त अवसर दिया गया था या नहीं और नगर मजिस्ट्रेट को इतनी बड़ी क्षतिपूर्ति लगाने का अधिकार था या नहीं—इन सभी सवालों पर आगे विस्तृत सुनवाई होने की संभावना है।
12 अक्टूबर की सुनवाई क्यों होगी महत्वपूर्ण?
अगली सुनवाई में राज्य सरकार और सहारनपुर प्रशासन का जवाब अदालत के सामने आ सकता है। इसके बाद कोर्ट तय करेगा कि याचिकाकर्ता की आपत्तियों में कितना कानूनी आधार है और क्या मामले में किसी अन्य अंतरिम आदेश की आवश्यकता है।
फिलहाल मस्जिद कमेटी को 6.41 करोड़ रुपये की वसूली से राहत मिल गई है, लेकिन ध्वस्तीकरण से जुड़े बड़े कानूनी सवालों का अंतिम जवाब अभी बाकी है। इसलिए 12 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई पर प्रशासन, मस्जिद कमेटी और राजनीतिक दलों की निगाहें टिकी रहेंगी।
