यूपी में आंदोलन किया तो सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी? योगी सरकार के नए आदेश पर सपा-कांग्रेस का विरोध, जानिए FIR का पूरा नियम

योगी सरकार ने सरकारी भर्तियों में चरित्र सत्यापन के नए नियम लागू किए हैं। हिंसक गतिविधियों से जुड़े अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रभावित हो सकती है। कांग्रेस ने युवाओं को डराने का आरोप लगाया, जबकि सपा ने आदेश की तुलना ब्रिटिश शासन से की।

UP Politics News: योगी सरकार की नई चरित्र सत्यापन नीति पर 29 अक्टूबर को राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। कांग्रेस के सुरेंद्र राजपूत और सपा के उदयवीर ने आदेश का विरोध किया। सरकार के नियमों के अनुसार केवल FIR या शांतिपूर्ण प्रदर्शन के आधार पर नौकरी से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | लखनऊ | 29 अक्टूबर 2026
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योगी सरकार की नई भर्ती सत्यापन नीति पर 29 अक्टूबर 2026 को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सवाल उठाए।

खबर में खास

  • 28 अक्टूबर को प्रमुख सचिव एम. देवराज ने सरकारी भर्तियों के चरित्र सत्यापन संबंधी नई नीति जारी की।
  • 29 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने नीति के कुछ प्रावधानों का विरोध किया।

  • हिंसक तरीकों से व्यवस्था बदलने के उद्देश्य वाले संगठनों से जुड़ाव नियुक्ति में अयोग्यता का आधार बन सकता है।

  • सिर्फ FIR दर्ज होने, जांच लंबित रहने या राजनीतिक विचारधारा के कारण अभ्यर्थी स्वतः अयोग्य नहीं होगा।

  • पुलिस को 30 दिनों के भीतर सत्यापन रिपोर्ट देनी होगी; कुछ चयनित अभ्यर्थियों को सत्यापन से पहले औपबंधिक नियुक्ति मिल सकेगी।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार की सरकारी नौकरियों से जुड़ी एक नई नीति पर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। राज्य सरकार ने सीधी भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों के चरित्र और पूर्ववृत्त सत्यापन के नियमों में बदलाव किया है। अब हिंसक तरीके से मौजूदा व्यवस्था बदलने के उद्देश्य वाली गतिविधियों या संगठनों से जुड़े व्यक्तियों की सरकारी नियुक्ति प्रभावित हो सकती है।
गुरुवार, 29 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इस आदेश पर आपत्ति जताई। विपक्ष का आरोप है कि नए प्रावधानों का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर दबाव बनाने के लिए हो सकता है।
हालांकि, सरकारी नीति में शांतिपूर्ण आंदोलन और हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर किया गया है। केवल किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थक होना या FIR दर्ज होना नौकरी से अयोग्य होने का स्वतः आधार नहीं है।

कांग्रेस ने कहा—युवाओं को डराने की कोशिश

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने सरकार पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भाजपा युवाओं के विरोध प्रदर्शनों को हिंसा के नाम पर अपराध से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
राजपूत ने आरोप लगाया कि सरकार नई पीढ़ी को डराना चाहती है, लेकिन इससे लोकतांत्रिक आंदोलन बंद नहीं होंगे।
उनका कहना था कि कांग्रेस इस तरह की व्यवस्था का विरोध करेगी। हालांकि, युवाओं को जानबूझकर झूठे मामलों में फंसाने का उनका आरोप स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है

समाजवादी पार्टी ने आदेश की तुलना ब्रिटिश शासन से की

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर ने भी नए नियमों की आलोचना की।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में विरोध दर्ज कराना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन चुनावों के जरिए होता है।
उदयवीर ने आदेश को ब्रिटिश शासन के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले प्रतिबंधात्मक तरीकों की याद दिलाने वाला बताया। उनके अनुसार, सरकारी आदेशों के जरिए लोगों को राजनीतिक असहमति जताने से डराना उचित नहीं है।
यह समाजवादी पार्टी की राजनीतिक प्रतिक्रिया है। सरकार ने अपने आदेश को हिंसक गतिविधियों और नियुक्ति सत्यापन से संबंधित बताया है।

आखिर सरकार के आदेश में क्या लिखा है?

नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने बुधवार, 28 अक्टूबर को नई व्यवस्था जारी की।
मीडिया रिपोर्टों में उद्धृत प्रावधानों के अनुसार, हिंसा के जरिए मौजूदा सामाजिक व्यवस्था बदलने के उद्देश्य वाले संगठनों की सक्रिय सदस्यता नियुक्ति में अयोग्यता का आधार बन सकती है।
लेकिन आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सामान्य राजनीतिक विचारधारा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन या केवल FIR दर्ज होने के कारण किसी अभ्यर्थी को स्वतः अयोग्य नहीं माना जाएगा।
अपराध की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

केवल FIR दर्ज होने पर क्या नौकरी नहीं मिलेगी?

नहीं। नई नीति के मुताबिक सिर्फ FIR दर्ज होने या पुलिस जांच लंबित होने से उम्मीदवार अपने आप अयोग्य नहीं होगा।
सत्यापन के दौरान पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई को सामान्यतः 30 दिनों में रिपोर्ट भेजनी होगी। प्रतिकूल रिपोर्ट आने पर अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा।
नियमों में एक राहत भी है। सामान्य पदों पर चयनित अभ्यर्थियों को चरित्र सत्यापन पूरा होने से पहले औपबंधिक नियुक्ति पत्र दिया जा सकता है। हालांकि, सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील पदों पर पहले विस्तृत जांच आवश्यक होगी।
आपराधिक रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी जानबूझकर छिपाने या गलत घोषणा करने पर नियुक्ति निरस्त हो सकती है।

2027 के चुनाव से पहले क्यों उठे सवाल?

उत्तर प्रदेश में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और अन्य मुद्दों को लेकर युवा समय-समय पर प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे में नई नीति के लागू होने के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति और हिंसक गतिविधि में प्रशासन किस आधार पर अंतर करेगा।
सरकार की घोषित व्यवस्था हिंसक गतिविधियों से संबंधित है, जबकि विपक्ष इसके संभावित दुरुपयोग की आशंका जता रहा है।
फिलहाल यह प्रमाणित नहीं है कि नई नीति के तहत किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को केवल आंदोलन में शामिल होने के कारण सरकारी नौकरी से वंचित किया गया हो।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों के अधिकार और सरकारी भर्ती की पारदर्शिता किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।

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