लाल टोपी के बाद सपा की ‘नीली ड्रेस’ पर छिड़ी सियासत, केशव मौर्य का हमला- ‘काली करतूतें नहीं छिपेंगी’
समाजवादी छात्र सभा की नीली टी-शर्ट और जींस वाली नई ड्रेस पर डिप्टी CM केशव मौर्य ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे ‘काली करतूतें ढकने का प्रयास’ बताया। इससे पहले मायावती भी सपा के इस बदलाव पर सवाल उठा चुकी हैं।
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समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई के नए नीले ड्रेस कोड पर उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। मायावती के बाद अब डिप्टी CM केशव प्रसाद मौर्य ने सपा पर हमला बोला है। वहीं अखिलेश यादव नीले रंग को संविधान, आंबेडकर, बहुजन समाज और नई पीढ़ी की सोच से जोड़ रहे हैं।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | लखनऊ | 12 सितंबर 2026
खबर में खास
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समाजवादी छात्र सभा ने अपनाई नीली टी-शर्ट और जींस
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केशव मौर्य बोले- ‘काली करतूतें ढकने का नया प्रयास’
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मायावती भी सपा के ‘नीले रंग’ पर साध चुकी हैं निशाना
सपा के ‘ब्लू लुक’ पर अब केशव मौर्य का हमला
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अब रंगों पर भी सियासत तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से लाल टोपी और लाल रंग से जुड़ी रही है, लेकिन अब पार्टी की छात्र इकाई समाजवादी छात्र सभा के लिए नीली टी-शर्ट और जींस को नया ड्रेस कोड बनाया गया है।
इसी बदलाव पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शनिवार को समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला।
केशव मौर्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सपा का नाम लिए बिना लिखा—“लाल टोपी, नीला लिबास-काली करतूतें ढकने का नया प्रयास!”
उनका निशाना सपा छात्र सभा की नई नीली पोशाक और पार्टी की पारंपरिक लाल टोपी की ओर था।
अखिलेश ने क्यों चुना नीला रंग?
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कुछ दिन पहले समाजवादी छात्र सभा की नई ड्रेस लॉन्च की थी।
नई व्यवस्था के तहत छात्र सभा के कार्यकर्ता अब कॉलेज और विश्वविद्यालयों में नीली टी-शर्ट और जींस या नीले कपड़ों में दिखाई देंगे।
अखिलेश यादव ने इसके पीछे राजनीतिक और वैचारिक कारण भी बताए।
उन्होंने नीले रंग को बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर, भारतीय संविधान, लोकतंत्र, बहुजन समाज, समानता और अन्याय के खिलाफ संघर्ष से जोड़ा। उनका कहना था कि नई पीढ़ी की सोच नई है, इसलिए उसकी पहचान भी नई होनी चाहिए।
कॉलेजों में युवाओं के बीच जाएगी सपा छात्र सभा
नई ड्रेस केवल कपड़ों का बदलाव नहीं है।
समाजवादी पार्टी ने इसके साथ छात्र और युवा मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने का अभियान भी तैयार किया है।
अखिलेश यादव के मुताबिक छात्र सभा के कार्यकर्ता विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और छात्रावासों में जाएंगे। वहां छात्रों को संगठन से जोड़ने के साथ समाजवादी विचारधारा के बारे में भी बताया जाएगा। इसके लिए करीब दो सप्ताह का छात्र जागरूकता अभियान चलाने की योजना है।
यही वजह है कि 2027 चुनाव से पहले इसे सपा की युवा और दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की बड़ी रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।
मायावती भी साध चुकी हैं निशाना
सपा के नीले रंग की ओर बढ़ने पर केवल भाजपा ही सवाल नहीं उठा रही है।
एक दिन पहले बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भी सपा पर हमला बोला था।
मायावती ने कहा कि केवल नीला गमछा या कपड़ा पहन लेने से किसी पार्टी की सोच नहीं बदल जाती। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे न तो सपा की सोच बदलेगी और न ही पार्टी दिल से आंबेडकरवादी बन जाएगी।
इसके बाद अब केशव मौर्य की टिप्पणी ने इस विवाद को और राजनीतिक बना दिया है।
लाल से नीले की ओर क्यों बढ़ रही सपा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंग केवल रंग नहीं होते, बल्कि लंबे समय से अलग-अलग राजनीतिक पहचान से जुड़े रहे हैं।
लाल रंग समाजवादी पार्टी की पहचान रहा है, जबकि नीला रंग उत्तर प्रदेश में आंबेडकरवादी और बहुजन राजनीति से गहराई से जुड़ा माना जाता है।
इसी वजह से सपा छात्र सभा का नीली ड्रेस अपनाना सिर्फ fashion change नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषणों में इसे 2027 से पहले दलित और युवा मतदाताओं तक सपा की पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
इससे पहले अखिलेश यादव खुद भी नीले गमछे में नजर आ चुके हैं। इसके बाद छात्र सभा की पूरी नई पोशाक में नीले रंग को शामिल किया गया।
क्या मायावती के वोट बैंक पर है अखिलेश की नजर?
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता लंबे समय तक BSP का सबसे मजबूत सामाजिक आधार रहे हैं।
लेकिन हाल के चुनावों में दलित वोटों में अलग-अलग दलों के बीच बंटवारा देखने को मिला है। इसी कारण 2027 की तैयारी में भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सभी इस वर्ग तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
सपा का PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक फॉर्मूला भी इसी बड़े सामाजिक समीकरण का हिस्सा है।
नीली ड्रेस और आंबेडकर के प्रतीकों को ज्यादा प्रमुखता देना इस रणनीति को जमीन पर दिखाई देने वाली पहचान देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। यह राजनीतिक विश्लेषण है; समाजवादी पार्टी आधिकारिक तौर पर नीले रंग को संविधान, समानता और नई पीढ़ी की सोच से जोड़ रही है।
2027 से पहले ‘रंगों’ की सियासत तेज
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है।
एक तरफ समाजवादी पार्टी युवा और दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए छात्र संगठन की नई पहचान तैयार कर रही है। दूसरी ओर BSP इसे अपने राजनीतिक प्रतीकों की नकल के तौर पर पेश कर रही है, जबकि भाजपा सपा के पुराने शासन और उसकी राजनीतिक छवि पर सवाल उठा रही है।
केशव मौर्य का ताजा हमला भी इसी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा माना जा रहा है।
अब बड़ा सवाल है—क्या सपा की लाल टोपी के साथ जुड़ा यह नया ‘नीला रंग’ 2027 में दलित और युवा मतदाताओं को पार्टी के करीब ला पाएगा, या मायावती और भाजपा के हमले इस रणनीति पर भारी पड़ेंगे?
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