बालाघाट में बच्चों की मौत पर गरमाई सियासत, अभिजीत दीपके को लेकर वायरल पोस्ट; ‘पिटाई’ से ‘नक्सल मुक्त’ दावे तक क्या है सच?

बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत के मुद्दे पर CJP प्रमुख अभिजीत दीपके के दौरे के बाद सोशल मीडिया पर कई दावे वायरल हैं। ‘पिटाई’, ‘2025 में नक्सल मुक्त’ और ‘1000 बच्चों के इलाज’ जैसे दावों की पड़ताल में तस्वीर अलग दिखती है।

बालाघाट बच्चों की मौत मामले में अभिजीत दीपके को लेकर वायरल दावों की पड़ताल

मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की बीमारी और मौत का मामला अब राजनीतिक विवाद बन गया है। अभिजीत दीपके को लेकर वायरल पोस्ट में कई दावे किए गए हैं, लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि कुछ दावे सही संदर्भ में नहीं हैं और कुछ की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | बालाघाट | 12 सितंबर 2026

   

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बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत के मुद्दे पर अभिजीत दीपके के दौरे के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे वायरल हो रहे हैं।

खबर में खास

  • बालाघाट के प्रभावित आदिवासी गांवों में पहुंचे अभिजीत दीपके
  • वायरल पोस्ट में ‘पिटाई’ और ‘भागने’ का दावा, स्वतंत्र पुष्टि नहीं
  • 2025 में बालाघाट के नक्सल-मुक्त होने का दावा सरकारी रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता

बालाघाट में आखिर चल क्या रहा है?

बालाघाट: मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में बच्चों की बीमारी और मौत का मामला अब स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ-साथ राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बन गया है।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके प्रभावित इलाकों में पहुंचे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने प्रशासन से बच्चों की मौत के मामले में जवाबदेही तय करने और प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत करने की मांग की। ताजा रिपोर्टों में 30 से अधिक बच्चों की मौत की बात कही जा रही है, हालांकि अलग-अलग समय पर सामने आए आधिकारिक और गैर-आधिकारिक आंकड़ों में अंतर रहा है।
इसी बीच सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल है, जिसमें दीपके पर कई गंभीर टिप्पणियां और दावे किए गए हैं।
पोस्ट में दावा किया गया है कि दीपके बालाघाट में “राजनीति करने” गए थे, वहां उनकी पिटाई हुई और वे सवालों का जवाब दिए बिना चले गए। इसी पोस्ट में यह भी कहा गया कि बालाघाट 2025 में नक्सल मुक्त हो चुका था और सरकार ने बीमारी से प्रभावित एक हजार से ज्यादा बच्चों को अस्पताल ले जाकर ठीक कराया।
लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय रिकॉर्ड देखने पर इनमें से कई दावों पर सवाल खड़े होते हैं।

क्या बालाघाट में अभिजीत दीपके की पिटाई हुई?

इस वायरल पोस्ट का सबसे सनसनीखेज दावा यही है कि बालाघाट पहुंचने के बाद अभिजीत दीपके के साथ मारपीट हुई और उन्हें वहां से भागना पड़ा।
12 सितंबर तक उपलब्ध विश्वसनीय राष्ट्रीय और स्थानीय समाचार रिपोर्टों में बालाघाट में दीपके की पिटाई होने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली है।
इसके उलट आज प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि दीपके ने प्रभावित आदिवासी इलाकों का दौरा किया, परिवारों से बातचीत की और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग उठाई।
इसलिए वायरल वीडियो या पोस्ट के आधार पर यह लिखना कि “दीपके की बालाघाट में पिटाई हुई”, फिलहाल तथ्य के रूप में प्रकाशित करना सही नहीं होगा।
यह दावा आगे किसी पुलिस बयान, स्थानीय प्रशासन की पुष्टि या विश्वसनीय वीडियो सत्यापन से प्रमाणित होता है तो खबर अपडेट की जा सकती है।

क्या 2025 में ही ‘नक्सल मुक्त’ हो गया था बालाघाट?

वायरल पोस्ट का दूसरा बड़ा दावा है कि बालाघाट 2025 में नक्सल मुक्त हो गया था।
यह दावा केंद्र सरकार के अप्रैल 2025 के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता।
केंद्रीय गृह मंत्रालय से जुड़ी PIB की आधिकारिक जानकारी में उस समय बालाघाट को देश के छह “Districts of Concern” में शामिल किया गया था, जहां वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत बताई गई थी। सरकार ने देश से नक्सलवाद समाप्त करने के लिए 31 मार्च 2026 का लक्ष्य बताया था।
इसलिए यह कहना कि बालाघाट 2025 में ही नक्सल मुक्त घोषित हो गया था, उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर सही नहीं है।
हालांकि इसके बाद सुरक्षा हालात में बदलाव हुआ हो सकता है, लेकिन वायरल पोस्ट में दी गई 2025 की टाइमलाइन सरकारी रिकॉर्ड से टकराती है।

क्या सरकार ने 1000 से ज्यादा बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर ठीक कराया?

वायरल पोस्ट में एक और दावा है कि बीमारी फैलने के बाद सरकार ने 1000 से ज्यादा बच्चों को अस्पताल पहुंचाकर ठीक कराया।
उपलब्ध केंद्रीय स्वास्थ्य आंकड़े इस संख्या की पुष्टि नहीं करते।
5 सितंबर तक केंद्र की ओर से साझा आंकड़ों के मुताबिक बालाघाट में 32 हजार से ज्यादा लोगों की मेडिकल स्क्रीनिंग की गई थी। इनमें 431 बच्चों को स्वास्थ्य संस्थानों में भर्ती किया गया, जिनमें 379 को इलाज के बाद छुट्टी मिल चुकी थी और 52 बच्चे इलाज या निगरानी में थे।
बाद की स्थानीय रिपोर्ट में स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हुए मरीजों की संख्या 453 बताई गई है।
इसलिए “1000 से ज्यादा बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर ठीक किया गया” वाला दावा उपलब्ध आंकड़ों से फिलहाल साबित नहीं होता।
यह संभव है कि वायरल पोस्ट में screening, OPD, घर-घर जांच और hospitalization के अलग-अलग आंकड़ों को मिला दिया गया हो।

सरकार ने क्या-क्या कदम उठाए?

इसका मतलब यह भी नहीं है कि प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की।
केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार ने प्रभावित इलाकों में बड़े स्तर पर स्वास्थ्य अभियान चलाया है।
स्वास्थ्य टीमों ने घर-घर जाकर सर्वे किया, malaria testing की, बच्चों की जांच की और गंभीर मामलों को अस्पताल भेजा। निगरानी को शुरुआती तीन गांवों से बढ़ाकर करीब 50 गांवों तक किया गया।
32,433 से अधिक लोगों की स्वास्थ्य जांच की गई। इसके अलावा 1 से 10 साल तक के 14,637 बच्चों को अतिरिक्त Measles-Rubella vaccine dose दी गई और छह मोबाइल मेडिकल यूनिट भी प्रभावित इलाकों में लगाई गईं।
सरकारी अभियान के तहत पेयजल स्रोतों की सफाई, कीटनाशक छिड़काव और फॉगिंग भी कराई गई।
5 सितंबर तक स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह भी बताया था कि पिछले सात दिनों में कोई नया measles case नहीं मिला था।

फिर बच्चों की मौत क्यों हुई?

शुरुआत में इन मौतों को एक “रहस्यमयी बीमारी” से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन केंद्र की जांच में अभी तक किसी एक बीमारी या pathogen को सभी मौतों का कारण नहीं माना गया है।
जांच में अलग-अलग बच्चों में measles, malaria, दोनों का co-infection, respiratory distress, dehydration, malnutrition, anaemia और shock जैसी स्थितियां सामने आई हैं।
यानी यह मामला किसी एक संक्रमण का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण और इलाज तक पहुंच से जुड़े कई कारकों का मिश्रण दिखाई देता है।

क्या ग्रामीण इलाज की जगह झाड़-फूंक पर भरोसा कर रहे थे?

वायरल पोस्ट में पूरे स्थानीय समुदाय को अंधविश्वास और झाड़-फूंक पर निर्भर बताया गया है।
इस दावे को भी उसी रूप में पूरे समुदाय पर लागू करना उचित नहीं होगा।
हालांकि शुरुआती रिपोर्टों में जरूर बताया गया था कि कुछ प्रभावित गांवों में कुछ परिवारों ने डॉक्टरों से संपर्क करने में देर की और faith healers तथा पारंपरिक अनुष्ठानों का सहारा लिया। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना था कि इसके चलते कुछ बच्चों को समय पर इलाज मिलने में कठिनाई हुई।
लेकिन इससे पूरे बैगा समुदाय को “अस्पताल पर भरोसा न करने वाला” कहना सही नहीं होगा।
प्रभावित इलाके दुर्गम हैं और अस्पताल तक पहुंच, कुपोषण तथा दूसरी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां भी इस संकट का हिस्सा रही हैं।

हाईकोर्ट तक पहुंचा बच्चों की मौत का मामला

बालाघाट में बच्चों की मौत का मामला अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है।
हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और बालाघाट कलेक्टर समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यानी सरकार की ओर से स्वास्थ्य अभियान चलाए जाने के बावजूद सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
अदालत अब यह जानना चाहती है कि मौतों की वास्तविक वजह क्या रही, स्वास्थ्य सेवाओं में कोई कमी थी या नहीं और प्रभावित बच्चों तक समय पर इलाज पहुंचाने के लिए क्या कदम उठाए गए।

दीपके ने सरकार पर क्या आरोप लगाया?

बालाघाट रवाना होने से पहले अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया था कि उनके दौरे का इंतजाम करने वाले कुछ आदिवासी छात्रों को पुलिस हिरासत में लेने की तैयारी कर रही है।
उन्होंने BJP शासित राज्यों पर सच सामने आने से डरने का आरोप भी लगाया। यह दीपके का राजनीतिक आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद बालाघाट की स्वास्थ्य त्रासदी अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय भी बन गई है।

वायरल पोस्ट में क्या सही और क्या संदिग्ध?

अब तक उपलब्ध जानकारी को सीधे समझें तो तस्वीर कुछ ऐसी है:
दीपके के बालाघाट पहुंचने की बात सही है। उन्होंने प्रभावित इलाकों का दौरा किया है।
बालाघाट में उनकी पिटाई और भागने के दावे की विश्वसनीय स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं है।
बालाघाट के 2025 में नक्सल मुक्त होने का दावा आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता, क्योंकि अप्रैल 2025 में केंद्र इसे LWE का “District of Concern” बता रहा था।
और 1000 से ज्यादा बच्चों को अस्पताल ले जाकर ठीक करने का आंकड़ा भी उपलब्ध स्वास्थ्य डेटा से पुष्ट नहीं होता। आधिकारिक तौर पर 5 सितंबर तक 431 बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी थी।
वहीं यह बात रिपोर्टों में सामने आई है कि कुछ प्रभावित परिवारों ने शुरुआत में पारंपरिक उपचार या faith healers का सहारा लिया, लेकिन पूरे स्थानीय समुदाय को इससे जोड़ देना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
बालाघाट में बच्चों की मौत एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मामला है। ऐसे में सोशल मीडिया की राजनीतिक लड़ाई के बीच सबसे जरूरी सवाल यही है—आखिर इतने बच्चों की जान क्यों गई और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या बदलेगा?

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