राम जन्मस्थान पर बयान देकर घिरे सपा के पूर्व सांसद एसटी हसन! विरोध के बाद मांगी माफी, बोले—श्रीराम मेरे आदर्श हैं

मुरादाबाद में सपा के पूर्व सांसद की टिप्पणी पर हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया और थाने में शिकायत दी। अब हसन ने सफाई दी है। जानिए अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले में क्या कहा गया था।

मुरादाबाद में सपा के पूर्व सांसद एसटी हसन के राम जन्मस्थान संबंधी बयान पर प्रदर्शन और पुलिस शिकायत हुई। विरोध के बाद हसन ने माफी मांगी। जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था।

मुरादाबाद/लखनऊ | 4 नवंबर 2026 | प्रत्यक्षदर्शी समाचार
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समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन ने भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर अपनी टिप्पणी को लेकर विरोध बढ़ने के बाद माफी मांगी।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन का भगवान श्रीराम के जन्मस्थान को लेकर दिया गया बयान राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आने के बाद मुरादाबाद में हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया, उनके पोस्टर पर कालिख पोती और पुलिस से कार्रवाई की मांग की। विरोध बढ़ने के बाद मंगलवार, 3 नवंबर की रात हसन ने माफी मांगते हुए भगवान श्रीराम को अपना आदर्श बताया।

खबर में खास

  • एसटी हसन का वीडियो 31 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर चर्चा में आया।
  • उन्होंने भगवान राम के जन्मस्थान और अयोध्या फैसले पर सवाल उठाए थे।
  • अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद और राष्ट्रीय बजरंग दल ने मुरादाबाद में प्रदर्शन किया।
  • कटघर थाने में लिखित शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की गई।
  • विरोध के बाद पूर्व सांसद ने अपने बयान पर सफाई और माफी दी।

आखिर एसटी हसन ने क्या कहा था?

31 अक्टूबर को सामने आए वीडियो में एसटी हसन भगवान श्रीराम के जन्मस्थान को लेकर सवाल उठाते दिखाई दिए।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने दावा किया कि अयोध्या में कई धार्मिक स्थलों को जन्मस्थान के रूप में मानने की परंपरा रही है और वास्तविक स्थान को लेकर अलग-अलग दावे हैं।
उन्होंने अयोध्या मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी टिप्पणी की।
हालांकि, उनके द्वारा अदालत और पुरातात्विक साक्ष्यों के बारे में कही गई बातों को अदालत के वास्तविक निष्कर्षों से अलग करके देखना जरूरी है।

मुरादाबाद में कैसे बढ़ा विरोध?

बयान का वीडियो प्रसारित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद और राष्ट्रीय बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने विरोध शुरू किया।
कार्यकर्ताओं ने लोहिया अस्पताल से मार्च निकाला और पूर्व सांसद के पोस्टर पर कालिख पोती।
अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के जिला महामंत्री रामपाल सिंह प्रजापति तथा राष्ट्रीय बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष रोहन सक्सेना ने टिप्पणी पर आपत्ति जताई।
इसके बाद कटघर पुलिस थाने में लिखित शिकायत देकर वीडियो की जांच और उचित कानूनी कार्रवाई की मांग की गई।
हालांकि, केवल शिकायत दिए जाने से FIR दर्ज होने की पुष्टि नहीं होती। इस मामले में FIR दर्ज होने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

विरोध के बाद एसटी हसन ने क्या सफाई दी?

तीन नवंबर की रात पूर्व सांसद ने मीडिया को जारी बयान में अपना पक्ष स्पष्ट किया।
हसन ने भगवान राम को पूरे भारत का आदर्श बताते हुए कहा कि उन्होंने मानवता, मर्यादा और माता-पिता की आज्ञा का पालन करने का संदेश दिया है।
उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी धर्म या आस्था का अपमान करना नहीं था।
पूर्व सांसद ने स्पष्ट किया कि यदि उनकी टिप्पणी से किसी की धार्मिक भावना आहत हुई है, तो वह इसके लिए क्षमा मांगते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में वास्तव में क्या कहा था?

अयोध्या मामले में 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था।
अदालत ने ASI रिपोर्ट के आधार पर माना कि विवादित मस्जिद के नीचे पहले से एक गैर-इस्लामी संरचना मौजूद थी। पुरातात्विक साक्ष्य उसके हिंदू धार्मिक मूल की ओर संकेत करते थे।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि इससे यह साबित नहीं होता कि मस्जिद बनाने के लिए किसी मंदिर को गिराया गया था।
फैसले में अदालत ने धार्मिक विश्वास के साथ कब्जे और अन्य कानूनी साक्ष्यों की जांच की। भूमि पर अधिकार का फैसला केवल आस्था के आधार पर नहीं किया गया था।
इसलिए हसन की टिप्पणी और अदालत के वास्तविक निष्कर्षों के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है।

अब आगे क्या होगा?

हसन ने अपनी टिप्पणी के लिए माफी मांग ली है, लेकिन पुलिस शिकायत पर आगे की कार्रवाई के बारे में कोई पुष्ट नई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
इस घटनाक्रम में अब दो बातें महत्वपूर्ण हैं—क्या शिकायत पर कोई औपचारिक कानूनी कार्रवाई होती है और क्या पूर्व सांसद की सफाई के बाद सार्वजनिक विरोध समाप्त होता है।
फिलहाल एसटी हसन का स्पष्टीकरण सामने आ चुका है। इस विवाद को समझने के लिए उनके बयान, विरोध करने वाले संगठनों की आपत्तियों और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित निष्कर्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

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