‘सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं’ वाली टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पटना HC के फैसले का स्वतः लिया संज्ञान

पटना हाईकोर्ट ने महिला की सलवार उतारने की कोशिश और छाती दबाने के कृत्य को रेप का प्रयास मानने से इनकार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताते हुए स्वतः संज्ञान लिया है।

पटना हाईकोर्ट के विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिला की सलवार उतारने और छाती दबाने को रेप की कोशिश न मानने वाली टिप्पणी पर गंभीर चिंता जताई।

‘सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं’ वाली टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पटना HC के फैसले का स्वतः लिया संज्ञान

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पटना हाईकोर्ट की विवादित टिप्पणी पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की समीक्षा शुरू की।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 23 सितंबर 2026

खबर में खास

  • पटना हाईकोर्ट की विवादित टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
  • महिला के कपड़े उतारने की कोशिश से जुड़ा है मामला
  • हाईकोर्ट ने इसे रेप की कोशिश मानने से किया था इनकार
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की समीक्षा
पटना हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। हाईकोर्ट ने एक मामले में महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसकी छाती दबाने के कृत्य को रेप की कोशिश मानने से इनकार कर दिया था। देश की सर्वोच्च अदालत ने फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताते हुए इस पर गंभीर चिंता जताई है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पटना हाईकोर्ट के फैसले और उसमें दर्ज टिप्पणियों की विस्तार से समीक्षा की जानी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि मामले के तथ्यों और आरोपी के कथित कृत्यों को देखते हुए हाईकोर्ट द्वारा निकाला गया कानूनी निष्कर्ष सही था या नहीं।

क्या था पटना हाईकोर्ट का फैसला?

यह मामला पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले से जुड़ा है। आरोप था कि आरोपी ने महिला को कमरे में बंद किया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाई।
पटना हाईकोर्ट ने माना था कि आरोपी का कथित व्यवहार महिला की गरिमा भंग करने और उसके साथ आपराधिक बल प्रयोग से जुड़ा है। हालांकि, अदालत ने कहा था कि उपलब्ध परिस्थितियां आरोपी को रेप की कोशिश के अपराध में दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
इसी आधार पर आरोपी को रेप की कोशिश के गंभीर आरोप से राहत दी गई थी। हाईकोर्ट की इस कानूनी व्याख्या और फैसले में इस्तेमाल भाषा को लेकर महिला अधिकारों से जुड़े संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी

मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आने पर CJI सूर्यकांत ने हाईकोर्ट की टिप्पणी पर नाराजगी जताई। शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि महिला के कपड़े उतारने की कोशिश और उसके शरीर को जबरन छूने जैसे कथित कृत्यों की कानूनी गंभीरता का आकलन किस आधार पर किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसले लिखते समय अदालतों को अधिक संवेदनशील और सावधान रहना चाहिए। न्यायिक आदेश में इस्तेमाल शब्द पीड़िता की गरिमा और पूरे मामले की गंभीरता के अनुरूप होने चाहिए।

अभी रद्द नहीं हुआ हाईकोर्ट का फैसला

यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेने का अर्थ यह नहीं है कि पटना हाईकोर्ट का फैसला तुरंत रद्द कर दिया गया है। शीर्ष अदालत ने फिलहाल मामले की समीक्षा शुरू की है।
आगे की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट केस के तथ्य, आरोपी के कथित कृत्य, हाईकोर्ट की कानूनी व्याख्या और संबंधित आपराधिक धाराओं को देखेगा। इसके बाद ही स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहेगा, उसमें बदलाव होगा या उसे रद्द किया जाएगा।

रेप की कोशिश कैसे तय होती है?

किसी मामले में रेप की कोशिश का अपराध तय करने के लिए अदालत आरोपी की मंशा और उसके द्वारा उठाए गए वास्तविक कदमों का परीक्षण करती है। केवल तैयारी और अपराध को अंजाम देने की स्पष्ट कोशिश के बीच कानूनी अंतर देखा जाता है।
हालांकि, ऐसे मामलों में हर घटना के तथ्य अलग होते हैं। किसी महिला के कपड़े उतारने, उसे बंद करने या जबरन छूने जैसी घटनाओं को सामान्य या मामूली मानकर नहीं देखा जा सकता। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट अब हाईकोर्ट के फैसले की कानूनी समीक्षा करेगा।

न्यायिक संवेदनशीलता पर फिर उठे सवाल

इस मामले ने एक बार फिर अदालतों के फैसलों में महिलाओं और यौन हिंसा से जुड़े मामलों में संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल की जरूरत को चर्चा में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी निर्देश दे चुका है कि न्यायिक आदेश रूढ़िवादी सोच या पीड़िता के प्रति असंवेदनशील धारणाओं पर आधारित नहीं होने चाहिए।
पटना हाईकोर्ट की विवादित टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों में बड़ा न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शीर्ष अदालत रेप की कोशिश की कानूनी सीमा को किस तरह स्पष्ट करती है। आने वाला फैसला न केवल इस मामले, बल्कि यौन अपराधों से जुड़े दूसरे मुकदमों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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