‘SIR का कोई मतलब नहीं, चुनाव आयोग की छवि हो रही खराब’, पूर्व आयुक्त अशोक लवासा के बयान से मचा सियासी घमासान

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने SIR की प्रक्रिया और उसके तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए होना चाहिए, मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा करने के लिए नहीं।

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने SIR को उद्देश्यहीन बताते हुए इसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्था की छवि खराब होते देख उन्हें दुख हुआ है।

SIR को लेकर चुनाव आयोग पहले ही विपक्ष के सवालों से घिरा है। अब पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने इसकी प्रक्रिया को उद्देश्यहीन बताते हुए पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके बयान के बाद चुनाव आयोग को लेकर जारी विवाद और तेज हो सकता है।

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पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने SIR की प्रक्रिया को उद्देश्यहीन बताते हुए चुनाव आयोग की छवि और पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 24 सितंबर 2026

खबर में खास

  • अशोक लवासा ने SIR प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल
  • कहा—चुनाव आयोग की छवि खराब होने का दुख
  • SIR की मौजूदा प्रक्रिया को बताया उद्देश्यहीन
  • Form-6 में माता-पिता से जुड़े सवाल पर भी आपत्ति
  • तकनीक और कानून को लेकर चुनाव आयोग को दी नसीहत
नई दिल्ली। मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने SIR की मौजूदा प्रक्रिया और चुनाव आयोग के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
एक समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में अशोक लवासा ने कहा कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि चुनाव आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्था की छवि खराब हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि SIR के कारण मतदाताओं को हो रही परेशानी को लेकर चुनाव आयुक्त भी चिंतित दिखाई दिए।

Questions Raised On SIR Process

अशोक लवासा ने कहा कि जिस तरीके से SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, उसमें सभी चीजें उचित तरीके से होती हुई दिखाई नहीं दे रही हैं। उन्होंने दावा किया कि इस बार SIR के लिए अपनाई गई प्रक्रिया का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया।
लवासा ने कहा कि चुनाव आयोग जब भी कोई नई व्यवस्था लागू करता है तो उसकी पूरी Guidelines जारी करता है। लोगों को स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि प्रक्रिया कैसे पूरी होगी और उसे लागू करने का उद्देश्य क्या है।
उनका कहना है कि इस बार Logical Discrepancy और Voter Mapping जैसे शब्दों के स्पष्ट मायने और मापदंड मतदाताओं के सामने नहीं रखे गए।

Technology Cannot Replace Law

अशोक लवासा ने तकनीक और कानून के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि तकनीक का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया को सहयोग देने के लिए किया जाना चाहिए। तकनीक ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों में बाधा पैदा हो।
उन्होंने सवाल किया कि यदि कोई नागरिक पिछले 20 या 25 वर्षों से मतदाता सूची में शामिल है और तकनीकी व्यवस्था उसे किसी पुराने रिकॉर्ड से जोड़ नहीं पा रही, तो इसका असर उसके मतदान के अधिकार पर क्यों पड़ना चाहिए?

Question Over Form-6

मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले Form-6 में माता-पिता से जुड़ा सवाल शामिल करने पर भी अशोक लवासा ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह सवाल चुनाव आयोग से पूछा जाना चाहिए कि इसे फॉर्म में शामिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
लवासा के अनुसार, SIR के माध्यम से जो लक्ष्य हासिल करने का दावा किया जा रहा है, उसे किसी आसान और कम परेशानी वाली प्रक्रिया से भी पूरा किया जा सकता था। इसी आधार पर उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को उद्देश्यहीन बताया।

Election Commission Already Facing Questions

SIR को लेकर पिछले कुछ दिनों से चुनाव आयोग के भीतर मतभेद होने के दावे भी सामने आए हैं। हालांकि आयोग ने साफ किया है कि बैठकों में अधिकारियों ने सवाल और सुझाव जरूर दिए थे, लेकिन किसी आयुक्त ने अंतिम निर्णय के खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई।
विपक्ष लगातार SIR की प्रक्रिया, मतदाताओं के नाम हटने और Form-6 में हुए बदलाव को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा है। अब पूर्व चुनाव आयुक्त का बयान आने के बाद आयोग पर अपनी प्रक्रिया और उसके मापदंडों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने का दबाव बढ़ सकता है।

Why The Statement Matters

अशोक लवासा पहले चुनाव आयोग के भीतर काम कर चुके हैं। इसलिए SIR की प्रक्रिया, पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर उनके सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
हालांकि, उनके विचार व्यक्तिगत हैं और चुनाव आयोग का पक्ष इससे अलग हो सकता है। ऐसे में अब नजर इस बात पर रहेगी कि आयोग लवासा के सवालों का कोई जवाब देता है या अपनी पिछली सफाई पर कायम रहता है।

SIR पर विपक्ष के आरोपों के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के सवालों ने विवाद को नया मोड़ दे दिया है। अब मामला केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनाव आयोग की पारदर्शिता, उसकी कार्यप्रणाली और मतदाताओं के अधिकारों पर आकर टिक गया है।

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