वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की किताब में दावा किया गया है कि 1977 के आम चुनाव की तारीख तय करने में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ज्योतिषी की भूमिका थी। चुनाव की घोषणा से पहले प्रधान सचिव पीएन धर ने मुख्य चुनाव आयुक्त टी. स्वामीनाथन को चाय पर बुलाकर गुप्त रूप से तैयारियां शुरू करने को कहा था।
आज चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर छिड़े विवाद के बीच जानिए वह दौर, जब प्रधानमंत्री के ज्योतिषी से जुड़ा था देश के आम चुनाव की तारीख तय होने का दावा
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को अचानक लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की थी। किताब में चुनाव की तारीख से ज्योतिषी के जुड़ाव का दावा किया गया है।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 30 सितंबर 2026
खबर में खास
18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने अचानक चुनाव का ऐलान किया
CEC टी. स्वामीनाथन को गोपनीय तरीके से तैयारी करने को कहा गया
नीरजा चौधरी की किताब में ज्योतिषी से तारीख तय होने का दावा
उस समय चुनाव आयोग में केवल एक आयुक्त हुआ करता था
चुनाव में कांग्रेस हारी और पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, SIR और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच 1977 के आम चुनाव से जुड़ा एक पुराना किस्सा फिर चर्चा में है। यह वह दौर था जब देश में आपातकाल लगा हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अचानक लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा कर पूरे देश को चौंका दिया था।
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अपनी किताब ‘हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड’ में दावा किया है कि 1977 के आम चुनाव की तारीख तय करने में इंदिरा गांधी के ज्योतिषी की भूमिका थी। हालांकि विस्तृत चुनाव कार्यक्रम बाद में चुनाव आयोग ने जारी किया था।
मुख्य चुनाव आयुक्त को चाय पर बुलाया गया
किताब के मुताबिक, दिसंबर 1976 में इंदिरा गांधी ने आम चुनाव कराने का फैसला कर लिया था। उन्होंने अपने प्रधान सचिव पीएन धर को तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी. स्वामीनाथन से संपर्क करने को कहा।
एक जनवरी 1977 को पीएन धर ने स्वामीनाथन को अपने घर चाय पर बुलाया। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने CEC को गोपनीय रूप से चुनाव की तैयारी शुरू करने के लिए कहा। अचानक मिली जानकारी से स्वामीनाथन भी हैरान थे। उस समय चुनाव आयोग में केवल एक ही चुनाव आयुक्त हुआ करता था।
नीरजा चौधरी की किताब के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ने मजाक में कहा कि इतनी बड़ी खबर केवल चाय के साथ नहीं दी जानी चाहिए। इस मुलाकात से चुनाव की तैयारियां शुरू हुईं, लेकिन फैसले की जानकारी लंबे समय तक बेहद सीमित लोगों के पास रखी गई।
ज्योतिषी ने तय की चुनाव की तारीख?
नीरजा चौधरी ने अपनी किताब में लिखा है कि इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को देश को चौंकाते हुए चुनाव कराने की घोषणा की, जबकि चुनाव की तारीखों के निर्धारण में प्रधानमंत्री के ज्योतिषी की भूमिका थी।
यह दावा किसी आधिकारिक चुनावी दस्तावेज के बजाय किताब में दर्ज विवरण पर आधारित है। चुनाव की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत 19 जनवरी को राष्ट्रपति ने लोकसभा भंग की। इसके बाद 10 फरवरी को अधिसूचना जारी हुई और चुनाव आयोग ने नामांकन, जांच, नाम वापसी तथा मतदान का विस्तृत कार्यक्रम घोषित किया।
इंदिरा को पहले से था हार का अंदेशा?
इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार रहे एचवाई शारदा प्रसाद के बेटे रवि विश्वेश्वरैया शारदा प्रसाद ने भी चुनाव की घोषणा से जुड़ा विवरण लिखा है। उनके मुताबिक, नवंबर 1976 में ही इंदिरा गांधी ने अपने करीबी अधिकारियों से कहा था कि वह आपातकाल समाप्त कर चुनाव कराएंगी।
उनके लेख के अनुसार, इंदिरा गांधी को यह भी अंदेशा था कि वह चुनाव हार सकती हैं, फिर भी वह देश को दोबारा चुनावी प्रक्रिया में ले जाना चाहती थीं। चुनाव की घोषणा होने तक कांग्रेस के कई बड़े नेताओं और यहां तक कि संजय गांधी को भी इसकी जानकारी नहीं थी।
रेडियो पर किया था चुनाव का ऐलान
इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को आकाशवाणी के माध्यम से देश को संबोधित करते हुए लोकसभा भंग करने और नए चुनाव कराने की सलाह देने की घोषणा की। उन्होंने कहा था कि संसद और सरकार को जनता के पास वापस जाकर अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों के लिए जनादेश लेना चाहिए।
इसके बाद 16, 18, 19 और 20 मार्च 1977 को मतदान हुआ। इस चुनाव को लोकतंत्र बनाम आपातकाल की लड़ाई के रूप में देखा गया। जनता पार्टी गठबंधन ने चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।
रायबरेली से इंदिरा, अमेठी से संजय हारे
1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने 295 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 154 सीटों तक सिमट गई। इंदिरा गांधी रायबरेली से और उनके बेटे संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए। उत्तर भारत में कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और 24 मार्च को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। इसके साथ ही आजाद भारत में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।
1977 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक था। प्रधानमंत्री के ज्योतिषी से चुनाव की तारीख जुड़ने का दावा आज भी चौंकाता है, लेकिन अंतिम फैसला जनता ने मतपेटियों में दिया—और पहली बार केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को बाहर कर दिया।