Amit Shah Punjab: 10 साल पहले BJP के खिलाफ जलाया था 'चिट्टा रावण', अब अमित शाह के साथ वही नेता; पंजाब में नई सियासी जंग

पंजाब के लुधियाना में अमित शाह ने नशे के प्रतीक 'चिट्टा रावण' का दहन किया। उनके साथ मौजूद रवनीत सिंह बिट्टू ने 2016 में कांग्रेस नेता रहते हुए इसी मुद्दे पर अकाली दल-BJP सरकार को घेरा था। अब नशे के मुद्दे पर AAP और BJP आमने-सामने हैं।

लुधियाना में अमित शाह ने 'चिट्टा रावण' जलाकर पंजाब को 2029 तक नशामुक्त बनाने का संकल्प लिया। दिलचस्प यह है कि रवनीत बिट्टू ने 2016 में कांग्रेस में रहते हुए इसी तरीके से BJP गठबंधन को घेरा था। अब निशाने पर AAP सरकार है।

खबर में खास

  • अमित शाह ने 20 अक्टूबर को लुधियाना में प्रतीकात्मक 'चिट्टा रावण' जलाया।
  • 2016 में कांग्रेस के रवनीत बिट्टू ने इसी तरीके से अकाली दल-BJP सरकार का विरोध किया था।

  • 2026 में वही बिट्टू भाजपा के नेता हैं और निशाने पर भगवंत मान की AAP सरकार।

  • शाह ने दो और मामलों की CBI जाँच तथा 31 दिसंबर 2029 तक नशामुक्त पंजाब का लक्ष्य रखा।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | लुधियाना/नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026
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लुधियाना में अमित शाह ने नशे के प्रतीक चिट्टा रावण का दहन किया।
पंजाब की राजनीति में दशहरे के मौके पर एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने दस साल पुरानी राजनीतिक कहानी को फिर चर्चा में ला दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार, 20 अक्टूबर को लुधियाना के ऐतिहासिक दरेसी मैदान में नशे के प्रतीक 'चिट्टा रावण' का दहन किया। उनके साथ भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू भी मौजूद थे।
दिलचस्प बात यह है कि साल 2016 में यही रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस में थे और उन्होंने पंजाब की तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार के खिलाफ इसी तरह 'चिट्टा रावण' जलाकर विरोध प्रदर्शन किया था।
दस साल बाद बिट्टू की पार्टी बदल चुकी है, लेकिन पंजाब में नशे का मुद्दा आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है। इस बार भाजपा के निशाने पर मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार है।
2016 में किसके खिलाफ जलाया था 'चिट्टा रावण'?
18 अक्टूबर 2016 को रवनीत सिंह बिट्टू और तत्कालीन कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लुधियाना में नशे के प्रतीकात्मक पुतले का दहन किया था।
उस समय पंजाब में प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली अकाली दल-BJP गठबंधन की सरकार थी। कांग्रेस का आरोप था कि राज्य में नशे के कारोबार पर प्रभावी रोक नहीं लगाई जा रही।
कांग्रेस ने नशे के मुद्दे को प्रमुख चुनावी सवाल बनाया था। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने।

दस साल बाद बदली पार्टी, लेकिन मुद्दा वही

राजनीति में बड़ा बदलाव 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आया, जब रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। कैप्टन अमरिंदर सिंह भी 2022 में भाजपा में शामिल हो चुके थे।
अब 20 अक्टूबर 2026 को अमित शाह ने उसी लुधियाना में नशे के प्रतीक 'चिट्टा रावण' का दहन किया। इस बार बिट्टू उनके साथ खड़े थे।
2016 में जिस राजनीतिक गठबंधन को बिट्टू नशे के मुद्दे पर घेर रहे थे, 2026 में वह उसी भाजपा का हिस्सा हैं। यही इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू है।

अमित शाह ने 2029 तक क्या संकल्प लिया?

लुधियाना में केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार पंजाब से नशे के कारोबार को समाप्त करने के लिए अभियान चलाएगी।
उन्होंने 31 दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशे के कारोबार से मुक्त करने का संकल्प व्यक्त किया।
शाह ने राज्य के तीन ऐसे परिवारों से मुलाकात की जिनके सदस्यों की मौत नशे के खिलाफ आवाज उठाने से जुड़ी घटनाओं के संदर्भ में चर्चा में रही है।
उन्होंने पंजाब सरकार से संबंधित दो अन्य मामलों की जाँच भी CBI को सौंपने का आग्रह किया। पंजाब सरकार पहले ही परविंदर सिंह झोटा की हत्या की जाँच CBI को देने की घोषणा कर चुकी है।
AAP सरकार ने अमित शाह को क्या जवाब दिया?
पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार ने केंद्र और भाजपा पर पलटवार किया है।
राज्य के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने सवाल उठाया कि पंजाब में नशे की आपूर्ति रोकने के लिए केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों ने क्या कदम उठाए हैं।
AAP का कहना है कि राज्य सरकार नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। दूसरी ओर भाजपा का आरोप है कि प्रदेश में नशे के कारोबार से जुड़े नेटवर्क के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई है।
दोनों पक्षों के ये राजनीतिक दावे हैं। नशे की वास्तविक स्थिति और सरकारी प्रयासों का मूल्यांकन स्वतंत्र अपराध, स्वास्थ्य एवं प्रवर्तन आँकड़ों के आधार पर करना आवश्यक है।

क्या पुतला जलाने से खत्म होगा पंजाब का नशा संकट?

पंजाब में नशे की समस्या वर्षों से चुनावी मुद्दा रही है। अकाली दल-BJP गठबंधन, कांग्रेस और AAP—तीनों के शासनकाल में नशे के खिलाफ अभियान और राजनीतिक आरोप सामने आते रहे हैं।
'चिट्टा रावण' के दहन को राजनीतिक संदेश और जनजागरूकता अभियान के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इससे नशे के कारोबार में वास्तविक कमी आई है या नहीं, यह अलग सवाल है।
इसके लिए तस्करी के मामलों, नशामुक्ति उपचार, आरोपियों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई और सीमापार तस्करी रोकने के उपायों की जाँच जरूरी है।

पंजाब चुनाव से पहले किसे मिलेगा राजनीतिक फायदा?

2027 में पंजाब विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में नशे की समस्या भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
लेकिन दस साल बाद फिर उसी प्रतीकात्मक विरोध का इस्तेमाल यह सवाल भी उठाता है कि सरकारें और राजनीतिक दल इस समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाल पाए।
प्रत्यक्षदर्शी का सवाल: पंजाब में दस साल बाद भी राजनीतिक दल 'चिट्टा रावण' जला रहे हैं। क्या अब जनता को नारों और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के बजाय नशे के खिलाफ काम का ठोस, जाँचने योग्य हिसाब नहीं मिलना चाहिए?

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