PM-DAKSH योजना पर कांग्रेस का बड़ा हमला: ₹130 करोड़ का बजट घटकर ₹20 करोड़ कैसे हुआ? जयराम रमेश ने मोदी सरकार से पूछा सवाल

दलितों, पिछड़ों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के कौशल प्रशिक्षण वाली PM-DAKSH योजना पर कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश ने दो साल तक योजना लागू नहीं होने का आरोप लगाया। सरकारी बजट में भी बड़ा संशोधन दिखता है।

कांग्रेस ने PM-DAKSH योजना में कथित अनियमितताओं पर मोदी सरकार को घेरा। सरकारी बजट दस्तावेज में 2025-26 का ₹130 करोड़ आवंटन संशोधित होकर ₹20 करोड़ दिखता है। जानिए जयराम रमेश के आरोप और सरकार के आँकड़े।

खबर में खास

  • जयराम रमेश ने PM-DAKSH योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर आरोप लगाए।
  • कांग्रेस का दावा—दो साल तक योजना प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुई।

  • 2025–26 में ₹130 करोड़ के बजट अनुमान को संशोधित करके ₹20 करोड़ किया गया।

  • सरकारी दस्तावेज में 2024–25 का वास्तविक व्यय ₹79.40 करोड़ दर्ज है।

  • केंद्र सरकार से प्रशिक्षण, लाभार्थियों और बजट उपयोग का हिसाब माँगने का सवाल।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026
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PM-DAKSH योजना के बजट और क्रियान्वयन पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल उठाए।
देश में बेरोजगारी और युवाओं के कौशल विकास को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर नया हमला बोला है। इस बार सवाल प्रधानमंत्री दक्षता और कुशलता संपन्न हितग्राही यानी PM-DAKSH योजना के क्रियान्वयन पर है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने बुधवार को आरोप लगाया कि वंचित वर्गों को प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर देने के उद्देश्य से शुरू की गई योजना अपने घोषित लक्ष्य के अनुरूप परिणाम नहीं दे पाई है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार के आधिकारिक बजट दस्तावेज में वित्त वर्ष 2025–26 के लिए योजना का शुरुआती बजट ₹130 करोड़ और संशोधित अनुमान सिर्फ ₹20 करोड़ दर्ज है। हालांकि यह अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार या योजना के पूरी तरह बंद होने का प्रमाण नहीं है।
जयराम रमेश ने मोदी सरकार पर क्या आरोप लगाया?
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर एक समाचार रिपोर्ट साझा करते हुए दावा किया कि PM-DAKSH योजना के संचालन में गंभीर कमियाँ सामने आई हैं।
उनके अनुसार, पिछले दो वर्षों में योजना अपेक्षित रूप से लागू नहीं हुई और पहले आवंटित धन का उपयोग नहीं होने से प्रशिक्षण के अवसर प्रभावित हुए।
रमेश ने कहा कि जिस योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग और दूसरे वंचित समुदायों को रोजगार के लिए तैयार करना था, वह प्रभावी परिणाम देने में विफल रही है।
उन्होंने सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतनी महत्वपूर्ण योजना लागू नहीं कर पाने वाली सरकार को अपने प्रदर्शन का हिसाब देना चाहिए।
सरकारी बजट में ₹130 करोड़ से ₹20 करोड़ कैसे हुए?
इस विवाद में सरकारी आँकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की 2026–27 की अनुदान मांगों के अनुसार PM-DAKSH योजना पर 2024–25 में ₹79.40 करोड़ का वास्तविक खर्च दर्ज है।
वित्त वर्ष 2025–26 के लिए शुरुआती बजट अनुमान ₹130 करोड़ था। बाद में संशोधित अनुमान घटाकर ₹20 करोड़ किया गया।
वहीं 2026–27 में इस योजना के नाम के सामने अलग बजट राशि दर्ज नहीं है।
यह जानकारी केंद्र सरकार के आधिकारिक बजट दस्तावेज में उपलब्ध है। लेकिन 2026–27 में अलग आवंटन न दिखाई देने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि योजना निश्चित रूप से समाप्त हो गई। इसके लिए संबंधित मंत्रालय की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
किन लोगों के लिए शुरू हुई थी PM-DAKSH योजना?
PM-DAKSH की शुरुआत 2020–21 में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों के कौशल विकास के लिए की गई थी।
योजना में अनुसूचित जातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों तथा सफाई कर्मचारियों जैसे समूहों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था है।
इसका उद्देश्य प्रशिक्षण के माध्यम से रोजगार या स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना है। योजना के अंतर्गत पात्र व्यक्तियों के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण जैसी सुविधाएँ निर्धारित है
क्या योजना के पैसे खर्च ही नहीं हुए?
यहाँ कांग्रेस के आरोप और उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
कांग्रेस ने एक रिपोर्ट के आधार पर हाल के वर्षों में योजना के संचालन और व्यय को लेकर सवाल उठाए हैं।
लेकिन सरकारी बजट में 2024–25 के लिए ₹79.40 करोड़ का वास्तविक व्यय दर्ज है। इसलिए यह कहना कि योजना के अंतर्गत कभी कोई पैसा खर्च ही नहीं हुआ, उपलब्ध आँकड़ों के अनुरूप नहीं होगा।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किन वित्त वर्षों और किन संस्थाओं के संबंध में शून्य व्यय का दावा किया गया है, कितने लोगों को प्रशिक्षण मिला और कितनों को वास्तविक रोजगार प्राप्त हुआ।

युवाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?

भारत में रोजगार पाने के लिए केवल प्रशिक्षण लेना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षण की गुणवत्ता, स्थानीय उद्योगों की मांग और रोजगार से जुड़ने की वास्तविक संभावना भी महत्वपूर्ण है।
ऐसे में किसी सरकारी कौशल विकास योजना की सफलता का आकलन केवल बजट आवंटन से नहीं, बल्कि प्रशिक्षित लाभार्थियों और रोजगार के परिणामों से होना चाहिए।
PM-DAKSH पर उठे सवाल इसी व्यापक जवाबदेही से जुड़े हैं।

अब सरकार से किन सवालों का जवाब जरूरी?

इस विवाद में तीन जानकारियाँ सामने आना जरूरी हैं—वित्त वर्ष 2025–26 में बजट क्यों घटाया गया, 2026–27 में योजना के लिए अलग राशि क्यों नहीं दिखाई गई और निर्धारित अवधि में कितने लाभार्थियों को प्रशिक्षण तथा रोजगार मिला।
21 अक्टूबर की उपलब्ध रिपोर्टों में कांग्रेस के आरोप दर्ज हैं, लेकिन उन विशिष्ट आरोपों पर संबंधित मंत्रालय का विस्तृत नया जवाब उपलब्ध नहीं मिला।
प्रत्यक्षदर्शी का सवाल: सरकारी कौशल प्रशिक्षण योजनाओं की सफलता का हिसाब विज्ञापनों और बजट से तय होना चाहिए या प्रशिक्षण के बाद वास्तव में रोजगार पाने वाले युवाओं की संख्या से?

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