UP Politics: योगी सरकार के मंत्री संजय निषाद का दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन, SC आरक्षण की मांग से BJP पर बढ़ा दबाव?

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 से पहले BJP की सहयोगी निषाद पार्टी ने दिल्ली में मछुआरा समाज के SC आरक्षण का मुद्दा उठाया है। मंत्री संजय निषाद के शक्ति प्रदर्शन से गठबंधन की राजनीति और सीटों के समीकरण पर चर्चा तेज है।

योगी सरकार के मंत्री संजय निषाद ने 21 अक्टूबर को दिल्ली में निषाद समाज के SC आरक्षण की मांग को लेकर शक्ति प्रदर्शन का आह्वान किया। जानिए BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए यह मुद्दा 2027 चुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली/लखनऊ | 21 अक्टूबर 2026
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21 अक्टूबर 2026 को निषाद पार्टी के SC आरक्षण अभियान, दिल्ली कार्यक्रम और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से जुड़ी राजनीति का सांकेतिक न्यूज ग्राफिक।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी निषाद पार्टी ने आरक्षण के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने बुधवार को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में मछुआरा समुदाय को एकजुट करने के लिए बड़े कार्यक्रम का आह्वान किया। इसका मुख्य उद्देश्य निषाद समाज की संबंधित जातियों को अनुसूचित जाति यानी SC सूची में शामिल करने की पुरानी मांग को केंद्र सरकार तक पहुँचाना है।
दिल्ली में मछुआरा समुदाय के सदस्यों के प्रदर्शन की जानकारी भी सामने आई है। संजय निषाद ने कार्यक्रम से पहले समर्थकों को एकजुट होकर अपने अधिकारों की आवाज उठाने का संदेश दिया था।
खबर में खास
  • 21 अक्टूबर को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में निषाद पार्टी का कार्यक्रम।
  • मछुआरा समुदाय से जुड़ी जातियों को SC दर्जा देने की मांग।

  • संजय निषाद BJP के सहयोगी और योगी सरकार में मंत्री हैं।

  • 2027 विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण के सवाल पर राजनीतिक सक्रियता तेज।

दिल्ली में संजय निषाद का शक्ति प्रदर्शन क्यों?

निषाद पार्टी ने इस आयोजन के लिए कार्यकर्ताओं और समाज के लोगों से दिल्ली पहुँचने की अपील की थी।
पार्टी ने मछुआरा समुदाय के सम्मान, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक हिस्सेदारी को प्रमुख मुद्दों के रूप में सामने रखा। संजय निषाद का कहना है कि समाज को संगठित होकर अपनी संवैधानिक मांग सरकार के सामने रखनी चाहिए।
कार्यक्रम की तैयारी प्रयागराज, सुल्तानपुर और अन्य जिलों में हुई बैठकों तथा सभाओं के बाद की गई थी।

सरकार में मंत्री, फिर सरकार से ही मांग क्यों?

संजय निषाद की पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन में है। वह स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य मंत्री हैं। इसके बावजूद उन्होंने आरक्षण को अपने संगठन की प्रमुख राजनीतिक मांग बनाए रखा है।
उन्होंने पहले कहा था कि यदि जरूरत पड़ी तो मंत्री पद छोड़ना स्वीकार होगा, लेकिन समाज के अधिकारों का मुद्दा नहीं छोड़ेंगे।
हालांकि इस बयान को BJP से गठबंधन तोड़ने का औपचारिक फैसला नहीं माना जा सकता। संजय निषाद सार्वजनिक रूप से भाजपा के साथ बने रहने की बात भी कह चुके हैं।
क्या निषाद समाज को अभी आरक्षण नहीं मिलता?
इस मुद्दे में एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।
उत्तर प्रदेश में निषाद, मल्लाह, केवट और कई संबंधित समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है। निषाद पार्टी की मांग उन्हें अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने से संबंधित है।
संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों की सूची में बदलाव के लिए संसदीय कानून आवश्यक होता है। इसलिए सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार की घोषणा से सभी संबंधित समुदायों को SC दर्जा नहीं मिल सकता।
इसी कानूनी चुनौती पर प्रत्यक्षदर्शी समाचार ने अपनी पिछली रिपोर्ट में विस्तार से जानकारी दी थी।

BJP के लिए 2027 से पहले यह मुद्दा कितना अहम?

पूर्वांचल और नदी किनारे बसे अनेक विधानसभा क्षेत्रों में निषाद, मल्लाह, केवट और संबंधित समुदायों का राजनीतिक महत्व है।
भाजपा को निषाद पार्टी जैसे सहयोगी दलों से इन समुदायों तक पहुँच बनाने में मदद मिलती रही है। वहीं बिहार के नेता मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी भी उत्तर प्रदेश में निषाद आरक्षण के मुद्दे पर अभियान चला रही है।
ऐसे में निषाद पार्टी का दिल्ली कार्यक्रम सिर्फ आरक्षण की मांग नहीं, बल्कि अपने समर्थकों को संगठित करने का राजनीतिक अवसर भी माना जा रहा है।
अब केंद्र सरकार के सामने क्या चुनौती?
निषाद पार्टी की मांग पर अभी किसी नए कानून या SC दर्जे की मंजूरी की पुष्टि नहीं हुई है।
अब मुख्य सवाल यह है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है और संजय निषाद चुनाव से पहले अपने समर्थकों को क्या ठोस परिणाम दिखा पाते हैं।
प्रत्यक्षदर्शी का सवाल: सत्ता में हिस्सेदारी होने के बावजूद यदि किसी सहयोगी दल की प्रमुख मांग लंबित है, तो क्या केवल राजनीतिक कार्यक्रम पर्याप्त होंगे या उसके समाधान के लिए स्पष्ट समयबद्ध पहल भी जरूरी है?

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