खरगे के बयान पर रामगोपाल यादव की दो टूक, मायावती ने भी उठाए सवाल

पीएम मोदी पर खरगे की टिप्पणी से सपा नेता रामगोपाल यादव ने असहमति जताई। मायावती ने भी नेताओं को व्यक्तिगत बयानबाजी से बचने की सलाह दी।

UP Politics: खरगे के बयान से रामगोपाल यादव ने असहमति जताई। मायावती ने भी राजनीतिक भाषा पर सवाल उठाए। जानिए पूरा विवाद।

खरगे के बयान पर कांग्रेस को सपा से ही नसीहत! रामगोपाल यादव बोले—बिल्कुल सहमत नहीं, मायावती ने भी उठाए सवाल

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खरगे की टिप्पणी पर रामगोपाल यादव ने असहमति जताई, मायावती ने भी राजनीतिक भाषा की मर्यादा का सवाल उठाया।

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | फिरोजाबाद/लखनऊ | 27 अक्टूबर 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की टिप्पणी पर जारी सियासी विवाद में अब उत्तर प्रदेश की राजनीति से नई प्रतिक्रिया सामने आई है। भाजपा के विरोध प्रदर्शन के बाद समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने भी खरगे के बयान से असहमति जताई है।
मंगलवार को फिरोजाबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान रामगोपाल यादव ने साफ कहा कि वह प्रधानमंत्री के पिता को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष की टिप्पणी से सहमत नहीं हैं। उन्होंने राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं को अपनी भाषा में संयम बरतने की सलाह दी।
वहीं, बसपा प्रमुख मायावती ने भी देश में बढ़ती व्यक्तिगत और अमर्यादित राजनीतिक बयानबाजी को अनुचित बताते हुए नेताओं से जनता के वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देने की अपील की है।

खबर में खास

  • सपा नेता रामगोपाल यादव ने खरगे के बयान से स्पष्ट असहमति जताई।
  • उन्होंने कहा कि बड़े नेताओं को सार्वजनिक भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।

  • मायावती ने राजनीतिक दलों के बीच व्यक्तिगत टिप्पणी और कटुता बढ़ने पर चिंता जताई।

  • कांग्रेस का कहना है कि खरगे की टिप्पणी का संदर्भ RSS था।

  • भाजपा पहले ही इस बयान पर आपत्ति जताकर विरोध प्रदर्शन कर चुकी है।

रामगोपाल यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष के बयान पर क्या कहा?

फिरोजाबाद में पत्रकारों से बातचीत में रामगोपाल यादव ने कहा कि राजनीतिक नेताओं को अपनी भाषा पर संयम रखना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिता को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने जो टिप्पणी की है, उससे वह सहमत नहीं हो सकते।
रामगोपाल यादव ने यह भी कहा कि यदि बड़े नेता ही अपने शब्दों पर नियंत्रण नहीं रखेंगे, तो छोटे नेताओं से बेहतर भाषा की अपेक्षा करना मुश्किल होगा।
उनकी प्रतिक्रिया इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस विपक्षी INDIA गठबंधन का हिस्सा रहे हैं। हालांकि, रामगोपाल की इस असहमति को दोनों दलों के बीच गठबंधन टूटने या किसी औपचारिक राजनीतिक दूरी की घोषणा नहीं माना जा सकता।

मायावती ने भी राजनीतिक बयानबाजी पर उठाए सवाल

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने भी मंगलवार को राजनीतिक दलों के बीच बढ़ते कटु संवाद पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक विरोध अब कई बार व्यक्तिगत और अपमानजनक टिप्पणियों तक पहुंच रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
मायावती ने गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि जनता चाहती है कि राजनीतिक दल इन समस्याओं के समाधान पर काम करें।
उनकी प्रतिक्रिया किसी एक गठबंधन के समर्थन में नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर की आलोचना के रूप में सामने आई है।

आखिर खरगे के किस बयान पर मचा विवाद?

यह विवाद 25 अक्टूबर को बिहार की राजधानी पटना में आयोजित एक कार्यक्रम से शुरू हुआ था।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को लेकर एक व्यक्ति की टिप्पणी सुनाई दी। इसके जवाब में खरगे ने कहा था, "मोदी का बाप भी जाएगा।"
भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता का अपमान बताया और अलग-अलग राज्यों में विरोध प्रदर्शन किया।
इसके बाद कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने खरगे का बचाव करते हुए कहा कि टिप्पणी का आशय प्रधानमंत्री के वास्तविक पिता से नहीं, बल्कि उनके वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में RSS से था। यह कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत स्पष्टीकरण है।

क्या सपा और कांग्रेस के राजनीतिक रिश्तों पर असर पड़ेगा?

रामगोपाल यादव की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस अध्यक्ष के हर बयान पर समाजवादी पार्टी के नेताओं की सहमति जरूरी नहीं है।
लेकिन केवल इस असहमति के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि दोनों दलों के गठबंधन में कोई औपचारिक बदलाव हुआ है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विपक्षी दलों के आपसी संबंध राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में बड़े नेताओं की सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं पर भी नजर बनी रहेगी।
फिलहाल इस घटनाक्रम ने एक अहम सवाल सामने रखा है—क्या राजनीतिक विरोध में नेताओं को व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचकर नीतियों और जनता से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए?

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