Election Commission News: 2 चुनाव आयुक्तों ने वरिष्ठ अफसर की शिकायत की, कैबिनेट सचिवालय ने नहीं की कार्रवाई! RTI से सामने आई वजह
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज पर सवाल उठाए थे। RTI से सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई करने के बजाय मामले की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को भेजी।
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: चुनाव आयोग के दो सदस्यों की शिकायत पर कैबिनेट सचिवालय ने सीधी कार्रवाई क्यों नहीं की? RTI दस्तावेजों से सामने आया अगस्त का फैसला और उसके पीछे दिया गया संवैधानिक तर्क।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026
भारतीय निर्वाचन आयोग के भीतर एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज को लेकर उठे सवालों पर अब सूचना के अधिकार (RTI) से महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने जुलाई में कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई करने के बजाय शिकायतों को दर्ज किया और मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को इसकी जानकारी भेज दी।
23 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय ने अपने आंतरिक रिकॉर्ड में यह तर्क दिया कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र व्यक्तिगत क्षमता में लिखे गए थे। पूरे निर्वाचन आयोग की औपचारिक शिकायत के बिना किसी अधिकारी पर कार्यवाही करना संवैधानिक संस्था के कामकाज में दखल माना जा सकता था।
खबर में खास
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चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को अलग-अलग पत्र लिखे थे।
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वरिष्ठ उपचुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कार्य आवंटन संबंधी आदेश पर सवाल उठाए गए।
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कैबिनेट सचिवालय ने 3 और 4 अगस्त को मामले पर आंतरिक विचार किया।
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5 अगस्त को शिकायतों की प्राप्ति की पुष्टि की गई, लेकिन सीधे कार्रवाई नहीं हुई।
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RTI में सामने आए रिकॉर्ड में संवैधानिक स्वतंत्रता को कार्रवाई न करने का आधार बताया गया।
आखिर दोनों चुनाव आयुक्तों ने किसकी शिकायत की थी?
मामला निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ उपचुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से संबंधित है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 27 जुलाई से 9 अगस्त के बीच प्रशासन विभाग के प्रभारी अधिकारी के अवकाश पर रहने के कारण मनीष गर्ग को अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई थी।
दोनों आयुक्तों ने अपने पत्रों में आपत्ति जताई कि गर्ग ने 28 जुलाई को वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे से जुड़ा आदेश जारी कर दिया, जबकि कथित तौर पर इससे पहले आयोग या संबंधित अधिकारियों से चर्चा नहीं की गई थी।
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने यह भी शिकायत की थी कि प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगने के बावजूद उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। ये आरोप आयुक्तों के पत्रों में दर्ज शिकायतों से संबंधित हैं; RTI रिकॉर्ड अपने आप में किसी अधिकारी का दोष सिद्ध नहीं करता।
कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
दोनों आयुक्तों के पत्र मिलने के बाद कैबिनेट सचिवालय में इस मामले पर विचार हुआ।
3 अगस्त की एक आंतरिक टिप्पणी में मुख्य चुनाव आयुक्त से राय लेने का सुझाव दिया गया था। लेकिन 4 अगस्त की टिप्पणी में यह दर्ज किया गया कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसका कामकाज अपने नियमों के अनुसार चलता है।
सचिवालय का तर्क था कि शिकायतें आयोग के दो सदस्यों ने अलग-अलग भेजी हैं, न कि आयोग ने संस्था के रूप में कोई औपचारिक निर्णय लेकर भेजी हैं।
इसी कारण सीधे कार्रवाई करने के बजाय दोनों पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करने और संबंधित जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) तक पहुंचाने का निर्णय लिया गया।
RTI में कौन-से महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले?
सेवानिवृत्त कमोडोर और पारदर्शिता कार्यकर्ता लोकेश के. बत्रा की RTI अर्जी के जवाब में कैबिनेट सचिवालय की आंतरिक टिप्पणियां और संबंधित पत्राचार सामने आया है।
इनमें 3 अगस्त और 4 अगस्त के विचार-विमर्श तथा 5 अगस्त को कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन की ओर से भेजे गए जवाब का विवरण शामिल है।
रिकॉर्ड से पता चलता है कि सचिवालय ने शिकायतों को प्राप्त करके दर्ज किया, लेकिन स्वयं कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की।
क्या दो चुनाव आयुक्तों की शिकायत आयोग का फैसला मानी जाएगी?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार, निर्वाचन आयोग में निर्णय यथासंभव सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए। मतभेद होने पर बहुमत से फैसला लिया जा सकता है।
कैबिनेट सचिवालय ने इसी बहु-सदस्यीय व्यवस्था का उल्लेख किया और कहा कि दो सदस्यों के अलग-अलग पत्रों को पूरी संस्था के औपचारिक निर्णय के बराबर नहीं माना जा सकता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों आयुक्तों की शिकायत निराधार सिद्ध हो गई। उपलब्ध रिकॉर्ड केवल यह स्पष्ट करता है कि कैबिनेट सचिवालय ने स्वयं कार्रवाई क्यों नहीं की।
अब आगे क्या स्पष्ट होना बाकी है?
इस खुलासे के बाद मुख्य सवाल निर्वाचन आयोग की आंतरिक प्रक्रिया से जुड़ा है।
क्या शिकायतों के बाद आयोग ने अपने स्तर पर जांच या समीक्षा की? संबंधित कार्य आवंटन आदेश की स्थिति क्या रही? और दोनों आयुक्तों को आयोग के भीतर क्या जवाब मिला?
RTI में सामने आए कैबिनेट सचिवालय के रिकॉर्ड से इन सभी सवालों का अंतिम जवाब नहीं मिलता।
सितंबर में चुनाव आयोग पहले भी अपने निर्णयों को लेकर कह चुका है कि अंतिम फैसले सामूहिक सहमति से लिए गए हैं। हालांकि वह व्यापक विवाद अलग-अलग प्रशासनिक निर्णयों से जुड़ा था।
फिलहाल स्थापित तथ्य यह है कि दो चुनाव आयुक्तों ने वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज पर आपत्ति दर्ज कराई थी और कैबिनेट सचिवालय ने उनकी शिकायतों पर सीधे कार्रवाई नहीं की। अब संबंधित आदेश और आयोग की आंतरिक प्रक्रिया का पूरा रिकॉर्ड सामने आने से ही आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
