Mehbooba Mufti News: 'कश्मीर की खामोशी को BJP शांति समझ रही है', महबूबा मुफ्ती का केंद्र पर हमला; अनुच्छेद 370 को लेकर उठाए सवाल
जम्मू-कश्मीर के विलय दिवस पर PDP अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि 1947 में भारत के साथ जुड़ने के पीछे विश्वास और संवैधानिक आश्वासन महत्वपूर्ण थे।
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महबूबा मुफ्ती ने 26 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के विलय दिवस पर भाजपा पर निशाना साधा। अनुच्छेद 370, नागरिक अधिकारों और 1947 के वादों का मुद्दा उठाया।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | श्रीनगर | 26 अक्टूबर 2026
खबर में खास
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महबूबा मुफ्ती ने भाजपा पर कश्मीर की खामोशी को सामान्य स्थिति बताने का आरोप लगाया।
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अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद की स्थिति पर सवाल उठाए।
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1947 के विलय से जुड़े विश्वास और संवैधानिक आश्वासनों की याद दिलाई।
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युवाओं के पासपोर्ट, छापेमारी और राजनीतिक अधिकारों का मुद्दा उठाया।
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कश्मीर की समस्याओं का समाधान बातचीत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकालने की मांग की।
विलय दिवस पर महबूबा मुफ्ती ने केंद्र को घेरा
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सोमवार, 26 अक्टूबर को केंद्र की भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठाए।
विलय दिवस के अवसर पर पार्टी के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत से जुड़ना विश्वास, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक आश्वासनों पर आधारित था।
महबूबा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि पिछले वर्षों में उन आश्वासनों को कमजोर किया गया है। उनके मुताबिक, 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधान निष्प्रभावी किए जाने के बाद स्थानीय लोगों की राजनीतिक चिंताएं बढ़ी हैं।
'यह शांति नहीं, डर है' — महबूबा मुफ्ती
महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सार्वजनिक विरोध कम दिखाई देने को शांति और सामान्य स्थिति का प्रमाण बताती है, जबकि उनके अनुसार यह खामोशी प्रतिबंधों और भय का परिणाम है।
मुफ्ती ने छापेमारी, हिरासत, यात्रा संबंधी पाबंदियों और युवाओं को पासपोर्ट मिलने में कथित कठिनाइयों का भी उल्लेख किया।
ये सभी महबूबा मुफ्ती के आरोप हैं। इन विशेष आरोपों पर केंद्र सरकार या भाजपा की नई आधिकारिक प्रतिक्रिया की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं मिली है।
1947 में भारत से विलय को लेकर क्या कहा?
26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। उस समय पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमण के बीच रियासत की सुरक्षा की स्थिति गंभीर थी।
महबूबा मुफ्ती ने कहा कि तत्कालीन नेतृत्व ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के धर्मनिरपेक्ष भारत की अवधारणा पर भरोसा किया था।
उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट पहचान, भूमि और रोजगार से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा का भरोसा भी इस ऐतिहासिक संबंध का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
हालांकि विलय पत्र, उसके बाद लागू हुए संवैधानिक प्रावधान और 2019 में हुए बदलाव अलग-अलग कानूनी घटनाक्रम हैं। इन्हें एक ही दस्तावेज की शर्तें नहीं माना जाना चाहिए।
अनुच्छेद 370 पर फिर उठाया सवाल
महबूबा मुफ्ती ने 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 से जुड़े संवैधानिक बदलावों का विरोध दोहराया।
उनका कहना था कि इन बदलावों से जम्मू-कश्मीर के लोगों के बीच विश्वास कमजोर हुआ और उनकी राजनीतिक पहचान तथा अधिकारों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी।
दूसरी ओर केंद्र सरकार लंबे समय से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को राष्ट्रीय एकीकरण, समान संवैधानिक व्यवस्था और विकास से जोड़ती रही है।
दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के केंद्र सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी। इसलिए महबूबा मुफ्ती का वर्तमान विरोध राजनीतिक और नीतिगत असहमति के रूप में समझा जाना चाहिए।
बातचीत से समाधान निकालने की अपील
महबूबा मुफ्ती ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का समाधान केवल सुरक्षा उपायों के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत वाले दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए केंद्र से राजनीतिक संवाद बढ़ाने की अपील की।
इसके साथ ही उन्होंने युवाओं से हिंसा से दूर रहने और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठाने को कहा।
PDP का अगला पार्टी सम्मेलन 2 नवंबर को प्रस्तावित है, जिसमें जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा होने की बात कही गई है।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में फिर उठा पुराना सवाल
