ज्यादा मेकअप देखकर एक्ट्रेस को चेहरा धोने भेज देते थे गुलजार, आखिर सादगी पर क्यों था इतना जोर?
गुलजार अपनी फिल्मों में कलाकारों का चेहरा बनावटी नहीं, स्वाभाविक दिखाना चाहते थे। अभिनेत्री ज्यादा मेकअप करके सेट पर पहुंचतीं तो वह उन्हें चेहरा धोकर आने के लिए कह देते थे। उनका मानना था कि किरदार की भावनाएं मेकअप की परतों में नहीं छिपनी चाहिए।
गुलजार की फिल्मों में कलाकारों का सहज और वास्तविक रूप यूं ही नजर नहीं आता था। बताया जाता है कि सेट पर किसी अभिनेत्री को ज्यादा मेकअप में देखकर वह तुरंत चेहरा धोकर आने को कह देते थे। जानिए उनकी फिल्मों में सादगी इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी।
नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार, लेखक और निर्देशक गुलजार की फिल्मों को संवेदनशील कहानियों, खूबसूरत संवादों और बिल्कुल स्वाभाविक किरदारों के लिए जाना जाता है। उनकी फिल्मों में पात्र अक्सर चमक-दमक से दूर और वास्तविक जिंदगी के बेहद करीब नजर आते थे। अब गुलजार की फिल्मों के सेट से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा सामने आया है।
बताया जाता है कि गुलजार को कलाकारों का जरूरत से ज्यादा मेकअप करना पसंद नहीं था। अगर कोई अभिनेत्री भारी मेकअप करके शूटिंग के लिए पहुंचती थी तो वह उसे चेहरा धोकर वापस आने के लिए कह देते थे। इसके पीछे किसी कलाकार को परेशान करना नहीं, बल्कि किरदार को पर्दे पर ज्यादा सहज और विश्वसनीय दिखाने का उनका अपना तरीका था।
चेहरे पर नहीं दिखनी चाहिए थी मेकअप की मोटी परत
लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, गुलजार अपनी फिल्मों में अभिनेत्रियों के स्वाभाविक चेहरे को प्राथमिकता देते थे। उन्हें ऐसा मेकअप पसंद नहीं था, जिससे कलाकार का वास्तविक चेहरा और उसके भाव छिप जाएं।
गुलजार का मानना था कि फिल्म के किरदार की भावनाएं उसकी आंखों और चेहरे के हाव-भाव से दर्शकों तक पहुंचनी चाहिए। ज्यादा मेकअप के कारण अगर चेहरे की सहजता कम हो जाए तो दृश्य का भाव भी कमजोर पड़ सकता है। यही कारण था कि वह शूटिंग के दौरान कलाकारों के लुक को लेकर काफी स्पष्ट रहते थे।
अभिनेत्री से कहते थे—पहले चेहरा धोकर आओ
रिपोर्ट में साझा किए गए किस्से के मुताबिक, जब कोई अभिनेत्री गुलजार की जरूरत से अधिक मेकअप करके सेट पर पहुंचती थी तो वह उसे चेहरा धोने के लिए कह देते थे। इसके बाद बेहद हल्के मेकअप के साथ शूटिंग की जाती थी।
आज फिल्मों में किरदारों के अलग-अलग लुक तैयार करने के लिए मेकअप, प्रोस्थेटिक्स और विजुअल इफेक्ट्स का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है। लेकिन गुलजार के निर्देशन की पहचान कलाकार के वास्तविक व्यक्तित्व और अभिनय को कैमरे के सामने उभारना थी। उनके लिए तकनीकी सजावट से ज्यादा महत्वपूर्ण वह भावना थी, जिसे कलाकार पर्दे पर व्यक्त कर रहा है।
किरदार को वास्तविक रखना चाहते थे गुलजार
गुलजार की फिल्मों में आम जिंदगी, मानवीय रिश्ते, अकेलापन, प्रेम और सामाजिक संघर्ष जैसे विषय प्रमुखता से दिखाई देते हैं। ऐसे विषयों में किरदार को जरूरत से ज्यादा सजाया हुआ दिखाना कहानी की वास्तविकता को प्रभावित कर सकता था।
उनकी कोशिश रहती थी कि दर्शक पर्दे पर किसी स्टार को नहीं, बल्कि कहानी के पात्र को देखें। इसीलिए कपड़ों, हेयर स्टाइल और मेकअप को भी किरदार की सामाजिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुसार तैयार किया जाता था।
‘आंधी’ से ‘मौसम’ तक अलग दिखी निर्देशन शैली
गुलजार ने अपने निर्देशन में ‘मेरे अपने’, ‘परिचय’, ‘कोशिश’, ‘अचानक’, ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘खुशबू’, ‘किनारा’, ‘इजाजत’, ‘लेकिन’ और ‘माचिस’ जैसी चर्चित फिल्में बनाईं। इन फिल्मों की कहानियां अलग-अलग होने के बावजूद उनमें एक समानता दिखाई देती है—किरदारों का सहज और जमीन से जुड़ा हुआ रूप।
उनकी फिल्मों में शानदार अभिनय के साथ छोटी-छोटी मानवीय भावनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता था। कैमरा कलाकार के चेहरे पर ठहरता था और संवाद से ज्यादा उसकी आंखें कई बार कहानी कहती नजर आती थीं। ऐसे दृश्यों में स्वाभाविक चेहरा गुलजार की कहानी कहने की शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता था।
गीतकार से लेकर ऑस्कर विजेता तक
गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उन्होंने गीतकार के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की और बाद में लेखक, संवाद लेखक तथा निर्देशक के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाई। उन्हें ‘जय हो’ गीत के लिए ऑस्कर और ग्रैमी पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें पद्म भूषण, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और ज्ञानपीठ सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
गुलजार से जुड़ा यह किस्सा बताता है कि उनके लिए सिनेमा केवल खूबसूरत दृश्य तैयार करने का माध्यम नहीं था। वह कैमरे के सामने किरदार का सच दिखाना चाहते थे। यही वजह है कि उनकी कई दशक पुरानी फिल्में और उनके पात्र आज भी दर्शकों को उतने ही वास्तविक एवं अपने से लगते हैं।
