सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग से फॉर्म-6 पर जवाब तलब! कांग्रेस ने लगाए 6 गंभीर आरोप, SIR की फाइलें सुरक्षित रखने की मांग

चुनाव आयोग ने 248 पन्नों के हलफनामे में SIR का बचाव किया। कांग्रेस ने फैसलों पर सवाल उठाए, सुप्रीम कोर्ट में 17 नवंबर को अगली सुनवाई होगी।

SIR Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा। कांग्रेस ने आयोग के हलफनामे पर छह आरोप लगाए। जानिए पूरा विवाद।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग से फॉर्म-6 पर जवाब तलब! कांग्रेस ने लगाए 6 गंभीर आरोप, SIR की फाइलें सुरक्षित रखने की मांग

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सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 संबंधी याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा। कांग्रेस ने SIR हलफनामे पर छह आपत्तियां उठाईं।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली/लखनऊ | 28 अक्टूबर 2026
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच जारी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। चुनाव आयोग ने अदालत में 248 पन्नों का हलफनामा देकर अपने फैसलों का बचाव किया है। वहीं कांग्रेस ने आयोग के जवाब पर छह गंभीर आपत्तियां उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।
मंगलवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 से जुड़ी एक नई याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा कि आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों की जांच की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।

खबर में खास

  • चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 248 पन्नों का जवाब दाखिल किया।
  • कांग्रेस ने SIR और फॉर्म-6 को लेकर छह बिंदुओं पर आपत्ति जताई।

  • विपक्ष ने चुनाव आयोग की आंतरिक फाइलें और टिप्पणियां सुरक्षित रखने की मांग की।

  • आयोग का दावा है कि SIR के महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

  • सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 से संबंधित नई याचिका पर जवाब मांगा।

  • अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की।
इस दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग की आंतरिक फाइलों और अधिकारियों के बीच हुए पत्राचार को सुरक्षित रखने का अनुरोध किया।
उनका तर्क था कि इन दस्तावेजों से यह पता चल सकता है कि SIR से जुड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे या नहीं।
अदालत ने कहा कि वह उठाए गए मुद्दों की जांच करेगी। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में फाइलें सुरक्षित रखने के लिए कोई अलग अंतिम आदेश जारी होने की पुष्टि नहीं है।

आखिर चुनाव आयोग के हलफनामे में क्या कहा गया?

चुनाव आयोग ने अदालत में बताया कि SIR की प्रक्रिया कानून के अनुसार शुरू की गई थी।
आयोग के मुताबिक 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी संबंधित आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से मंजूर किए गए थे।
आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता पंजीकरण के वैधानिक फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया।
उसका तर्क है कि SIR के दौरान मांगा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज था। ऑनलाइन आवेदन में उसकी प्रस्तुति से दोनों एक ही फॉर्म का हिस्सा लग सकते थे।
आयोग के अनुसार, 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन आवेदन में दोनों दस्तावेजों को अलग दिखाने की व्यवस्था कर दी गई है

कांग्रेस ने कौन से छह सवाल उठाए?

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने चुनाव आयोग के हलफनामे को भ्रामक बताते हुए छह प्रमुख मुद्दों पर सवाल उठाए।
इनमें फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ने की प्रक्रिया, SIR संबंधी फैसलों में तीनों आयुक्तों की सहमति, ECINET के जरिए मतदाता सूची का प्रबंधन, आयोग के आईटी विभाग की कार्यप्रणाली और फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग जैसे विषय शामिल हैं।
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि आयोग ने मीडिया में सामने आए कुछ आरोपों का पर्याप्त जवाब नहीं दिया।
जयराम रमेश का दावा है कि चुनाव आयोग के कई फैसले सर्वसम्मति के बजाय एकतरफा तरीके से लिए गए।
हालांकि, ये कांग्रेस के आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन आरोपों को सही साबित करने वाला कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर भी विवाद

सितंबर में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों के दौरान कुछ फैसलों पर लिखित रूप से कई बार आपत्ति दर्ज की थी।
इसी रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल बढ़े।
हालांकि, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में इस बात पर जोर दिया है कि SIR शुरू करने वाले प्रमुख आदेश सामूहिक निर्णय से जारी किए गए थे।
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह है कि संबंधित आदेशों की औपचारिक स्वीकृति और उनके क्रियान्वयन से जुड़े अन्य प्रशासनिक निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए गए।

फॉर्म-6 पर नई याचिका किसने दायर की?

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद डोला सेन ने सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर की है।
उनका आरोप है कि बिहार में SIR के दौरान फॉर्म-6 की ऑनलाइन प्रक्रिया में ऐसे बदलाव किए गए, जिनकी सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृति नहीं मिली थी।
उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत में पक्ष रखा।
इस पर अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा। आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता ने आरोपों का विरोध किया।
यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत द्वारा जवाब मांगने का अर्थ आरोपों को सही मान लेना नहीं है।

आम मतदाता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फॉर्म-6?

फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।
यदि इसके साथ अतिरिक्त दस्तावेज या घोषणा-पत्र की शर्तें जुड़ती हैं, तो सवाल उठ सकता है कि आवेदन की प्रक्रिया कानून के अनुरूप है या नहीं।
चुनाव आयोग का कहना है कि वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव नहीं हुआ, जबकि विपक्ष और याचिकाकर्ताओं का आरोप ऑनलाइन प्रक्रिया में बदलाव को लेकर है।
इस मुद्दे का अंतिम कानूनी समाधान सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और आदेशों से स्पष्ट होगा।

17 नवंबर की सुनवाई में क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए दस दिन का समय दिया है।
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को तय की गई है।
उस सुनवाई में आयोग की निर्णय प्रक्रिया, फॉर्म-6 के संबंध में उठे सवाल और याचिकाकर्ताओं की अन्य आपत्तियां फिर अदालत के सामने आ सकती हैं।

2027 चुनाव से पहले यूपी के लिए क्या मायने?

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। मतदाता सूची और उसकी पारदर्शिता पहले से भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक विवाद के विषय बने हुए हैं।
ऐसे में SIR से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का महत्व राष्ट्रीय स्तर के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी है।
हालांकि, अभी अदालत के सामने चल रही सुनवाई का अर्थ यह नहीं है कि यूपी की मतदाता सूची अमान्य हो गई है या चुनाव प्रक्रिया रोक दी गई है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल है—क्या सुप्रीम कोर्ट के सामने मौजूद दस्तावेज चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठी शंकाओं का समाधान कर पाएंगे, या इस विवाद में नए तथ्य सामने आएंगे?
इसका जवाब आने वाली सुनवाई और अदालत के आदेशों से ही मिलेगा।

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