कांग्रेस की 150 सीटों की मांग पर अखिलेश का नया फॉर्मूला—‘प्रत्याशी का नाम बताइए, सीट ले जाइए’
UP Election 2027 से पहले सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की खींचतान तेज हो गई है। अखिलेश यादव ने साफ संकेत दिया है कि केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि मजबूत और जिताऊ उम्मीदवार देखकर ही कांग्रेस को सीटें दी जाएंगी।
कांग्रेस के कुछ नेताओं की 150 सीटों की मांग के बीच अखिलेश यादव ने सीट बंटवारे का नया फॉर्मूला सामने रखा है। सपा ने कांग्रेस से दावेदारी वाली सीटों के साथ संभावित उम्मीदवारों के नाम और उनकी जमीनी ताकत का विवरण मांगा है।
कांग्रेस को सीटों की संख्या नहीं, उम्मीदवार की ताकत दिखानी होगी; अखिलेश यादव ने 2017 के खराब नतीजों से लिया बड़ा सबक
UP Election 2027 के सीट बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने कांग्रेस के सामने जिताऊ उम्मीदवार बताने की शर्त रखी है।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | उत्तर प्रदेश डेस्क | 29 सितंबर 2026
खबर में खास
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने की 150 विधानसभा सीटों की मांग
अखिलेश यादव ने रखा जिताऊ उम्मीदवार वाला फॉर्मूला
कांग्रेस से सीटों के साथ संभावित प्रत्याशियों की सूची मांगी गई
सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी और बाराबंकी पर फंस सकता है पेच
2017 में कांग्रेस 105 सीटों में केवल 7 पर जीती थी
गठबंधन की ड्राइविंग सीट अपने पास रखना चाहती है सपा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन तय माना जा रहा है, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान लगातार बढ़ रही है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग उठाई है। इसके जवाब में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक नया राजनीतिक फॉर्मूला सामने रख दिया है—“प्रत्याशी का नाम बताइए, सीट ले जाइए।”
अखिलेश यादव ने संकेत दिया है कि गठबंधन में सीटें केवल मांग, दबाव या किसी पुराने फॉर्मूले के आधार पर नहीं दी जाएंगी। सीट पाने के लिए कांग्रेस को यह बताना होगा कि उसके पास संबंधित विधानसभा क्षेत्र में कौन-सा मजबूत उम्मीदवार है और उसकी जीतने की संभावना कितनी है।
कांग्रेस से उम्मीदवारों की सूची मांग रही सपा
सपा का कहना है कि कांग्रेस जिन विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, उसे उन सीटों के साथ संभावित उम्मीदवारों के नाम भी देने होंगे। पार्टी को यह भी बताना होगा कि वहां कांग्रेस का कितना जनाधार है, उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ कैसी है और वह बीजेपी को हराने की स्थिति में है या नहीं।
अखिलेश यादव लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि गठबंधन का उद्देश्य किसी पार्टी की सीटों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि बीजेपी को हराना होना चाहिए। इसलिए मजबूत उम्मीदवार ही सीट बंटवारे का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनेगा।
150 सीटों की मांग ने बढ़ाया दबाव
कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से लेकर इमरान मसूद तक पार्टी के कुछ नेता 150 सीटों की मांग कर चुके हैं। दूसरी तरफ सपा का मानना है कि कांग्रेस जितनी सीटें मांग रही है, उतनी सीटों पर उसके पास मजबूत संगठन और जिताऊ चेहरे मौजूद नहीं हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की 17 सीटें दी थीं। इस अनुपात के आधार पर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हिस्सेदारी करीब 80 से 85 सीटों के आसपास बैठती है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से 100 से लेकर 150 सीटों तक की मांग सामने आ रही है।
2017 के नतीजों ने सपा को किया सतर्क
सपा के सख्त रुख के पीछे 2017 के विधानसभा चुनाव का अनुभव भी बड़ी वजह माना जा रहा है। उस समय सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस को 105 सीटें दी गई थीं, लेकिन पार्टी केवल सात सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी।
अखिलेश यादव इस बार 2017 जैसी गलती दोहराने के पक्ष में नहीं हैं। सपा उन विधानसभा क्षेत्रों को कांग्रेस के लिए छोड़ना नहीं चाहती, जहां उसका अपना मजबूत संगठन, विधायक या प्रभावशाली उम्मीदवार मौजूद है।
इन जिलों में फंस सकता है सीटों का पेच
सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी और बाराबंकी जैसे जिलों में सीट बंटवारा आसान नहीं होगा। इन क्षेत्रों में कांग्रेस अपना मजबूत राजनीतिक आधार बताती है, लेकिन कई विधानसभा सीटों पर सपा के विधायक और मजबूत स्थानीय नेता मौजूद हैं।
सपा का कहना है कि वह केवल उन्हीं क्षेत्रों में अपनी सीट छोड़ने पर विचार करेगी, जहां कांग्रेस के पास उससे ज्यादा मजबूत उम्मीदवार और बेहतर चुनावी समीकरण होगा। सीट देने से पहले संबंधित उम्मीदवार की लोकप्रियता, जातीय समीकरण और स्थानीय संगठन का आकलन किया जाएगा।
2024 का फॉर्मूला दोहराने की तैयारी
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उम्मीदवार की जीतने की क्षमता को पार्टी के चुनाव चिह्न से ज्यादा महत्व दिया था। प्रयागराज लोकसभा सीट पर सपा से जुड़े उज्ज्वल रमण सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत दर्ज की।
अखिलेश यादव इसी तरह का प्रयोग विधानसभा चुनाव में भी करना चाहते हैं। मजबूत उम्मीदवार किसी भी गठबंधन सहयोगी के पास हो, चुनावी मैदान में उसी को उतारने पर विचार किया जा सकता है।
गठबंधन की कमान अपने पास रखेगी सपा
अखिलेश यादव के इस फॉर्मूले को कांग्रेस पर राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। सपा यह संदेश दे रही है कि उत्तर प्रदेश में INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी वही है और सीट बंटवारे की अंतिम शर्तें भी उसकी चुनावी रणनीति के अनुसार तय होंगी।
कांग्रेस ने भी संभावित उम्मीदवारों और सीटों की सूची तैयार करनी शुरू कर दी है। अब दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत के बाद ही साफ होगा कि कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी और किन क्षेत्रों में सपा अपना दावा छोड़ने को तैयार होगी।
अखिलेश यादव के ‘प्रत्याशी बताइए, सीट ले जाइए’ फॉर्मूले ने सपा-कांग्रेस गठबंधन की असली परीक्षा शुरू कर दी है। कांग्रेस के सामने अब केवल बड़ी संख्या मांगने के बजाय हर सीट पर अपनी जमीनी ताकत और जिताऊ चेहरा साबित करने की चुनौती होगी। उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद ही तय होगा कि दोनों दलों का गठबंधन बीजेपी के खिलाफ मजबूत होगा या सीटों की खींचतान में उलझ जाएगा।