वैश्विक संकट के बीच ट्रेड की जंग—भारत की डील पर सियासी टकराव तेज

वैश्विक संकट के बीच ट्रेड की जंग—भारत की डील पर सियासी टकराव तेज

नई दिल्ली।  दुनिया इस समय कई बड़े संघर्षों से गुजर रही है—यूक्रेन-रूस युद्ध, इजराइल-हमास टकराव और अब ईरान से बढ़ता तनाव। इन हालातों ने वैश्विक व्यापार को गहरे असर में डाल दिया है। रेड सी संकट, होर्मुज स्ट्रेट पर खतरा, शिपिंग रूट्स का बदलना और बढ़ती इंश्योरेंस लागत ने अंतरराष्ट्रीय ट्रेड को धीमा कर दिया है। WTO ने भी चेतावनी दी है कि 2026 में वैश्विक व्यापार वृद्धि बहुत सीमित रह सकती है।ऐसे समय में भारत की राजनीति में भी ट्रेड को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार India-US इंटरिम ट्रेड डील पर सवाल उठा रहे हैं। संसद और अपनी रैलियों में उन्होंने इस समझौते को किसानों, उद्योग और डेटा सुरक्षा के लिए नुकसानदायक बताया है। उनका कहना है कि इस डील से भारत को बराबरी का फायदा नहीं मिलेगा और सरकार को इसे रद्द करने पर विचार करना चाहिए।

राहुल गांधी ने अपने बयानों में यह भी दावा किया कि इस समझौते में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो भारतीय उद्योग और डेटा हितों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि जल्दबाजी में यह डील की गई और संसद में इस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई।वहीं दूसरी तरफ सरकार और भाजपा इस आलोचना को खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा वैश्विक संकट के बीच यह ट्रेड डील भारत के लिए नए बाजारों तक पहुंच और सप्लाई चेन को सुरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। सरकार का दावा है कि इससे खासकर टेक्सटाइल और अन्य निर्यात क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है और भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में वैश्विक सप्लाई चेन पहले से ज्यादा अस्थिर हो गई है। रेड सी में हमलों के कारण जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है, जिससे लागत बढ़ रही है। वहीं होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव ने ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में देशों के लिए वैकल्पिक व्यापार साझेदार और सुरक्षित रूट्स खोजना जरूरी हो गया है। इसी वजह से भारत के लिए भी यह जरूरी हो गया है कि वह अपने व्यापारिक विकल्पों को मजबूत करे और नए समझौतों के जरिए जोखिम कम करे। हालांकि इस पर राजनीतिक मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं—एक पक्ष इसे अवसर मान रहा है, तो दूसरा इसे संभावित खतरे के रूप में देख रहा है।पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि जब दुनिया तेजी से बदल रही है और वैश्विक व्यापार नए समीकरणों की ओर बढ़ रहा है, तो क्या भारत को तेजी से निर्णय लेने चाहिए या ज्यादा सतर्क होकर हर पहलू पर विचार करना चाहिए?

 

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