“असम से बंगाल तक सियासी संग्राम! महागठबंधन vs हिमंत—क्या बदलेगा खेल?
असम। असम विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। शिवसागर और गुवाहाटी से आई खबरों के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई ने 6 प्रमुख विपक्षी दलों के महागठबंधन का ऐलान कर दिया है। यह गठबंधन सीधे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और भाजपा सरकार को चुनौती दे रहा है। गोगोई ने साफ शब्दों में कहा कि इस बार भाजपा के खिलाफ वोटों का बंटवारा नहीं होगा और एकजुट विपक्ष सरकार को सत्ता से बाहर कर देगा।
का बयान चुनावी माहौल को और गर्म कर चुका है। उन्होंने कहा कि छह दलों के इस गठबंधन से विपक्षी वोट एकजुट होंगे और जनता तक एक मजबूत संदेश जाएगा। उनका दावा है कि अगर वोट बंटे नहीं, तो भाजपा को हराना संभव है। यह बयान सिर्फ राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि सीधी चुनौती है—“हम मिलकर हिमंत बिस्वा सरमा को सत्ता से बाहर करेंगे।”
इस महागठबंधन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ असम जातीय परिषद (AJP), रायजोर दल, CPI(M), CPI(ML) और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (APHLC) शामिल हैं। कांग्रेस ने 126 में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जबकि बाकी सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ी गई हैं। इससे साफ है कि विपक्ष हर सीट पर एक मजबूत उम्मीदवार उतारकर भाजपा को सीधी टक्कर देना चाहता है।
यह गठबंधन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले चुनावों में विपक्षी वोटों के बंटवारे ने भाजपा को सीधा फायदा पहुंचाया था। कई सीटों पर विपक्ष के अलग-अलग उम्मीदवारों ने एक-दूसरे का वोट काटा, जिससे भाजपा को जीत आसान हुई। लेकिन इस बार विपक्ष उसी गलती को सुधारने की कोशिश कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह एकता जमीन पर दिखती है, तो भाजपा के लिए यह चुनाव अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
लेकिन इस चुनाव में सिर्फ गठबंधन ही नहीं, बल्कि एक और बड़ा मुद्दा उभरकर सामने आया है—ध्रुवीकरण। असम की राजनीति अब धीरे-धीरे “पहचान और वोट बैंक” की लड़ाई में बदलती नजर आ रही है। एक तरफ “Indigenous vs Infiltrator” यानी असमिया अस्मिता का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ “Hindu consolidation vs Minority unity” की बहस तेज हो गई है।
यही पैटर्न पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिल रहा है। वहां टीएमसी पर मुस्लिम वोट बैंक को साधने और तुष्टिकरण के आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा हिंदू वोटों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही है। टीएमसी नेता हुमायूं कबीर के “मुस्लिम मुख्यमंत्री” वाले बयान ने इस बहस को और भड़का दिया है। भाजपा ने इसे सीधा ध्रुवीकरण बताकर हमला बोला है।
असम में भी बयानबाजी तेज हो चुकी है। गौरव गोगोई ने हिमंत सरकार पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ सख्त कार्रवाई और माहौल खराब करने के आरोप लगाए हैं। वहीं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पलटवार करते हुए उन्हें “पाकिस्तानी एजेंट” तक कह दिया। इस तरह के तीखे बयान इस चुनाव को और ज्यादा संवेदनशील बना रहे हैं।
भाजपा की रणनीति भी बिल्कुल साफ दिख रही है। पार्टी ने अपनी उम्मीदवारों की सूची में एक भी मुस्लिम चेहरा शामिल नहीं किया है और “घुसपैठ”, “बांग्लादेशी” और eviction drive जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है। भाजपा इसे असमिया पहचान और सुरक्षा का सवाल बता रही है। Delimitation के बाद सीटों के समीकरण में हुए बदलाव ने भी इस रणनीति को मजबूती दी है।
वहीं विपक्ष अपनी छवि को “सेकुलर” बनाए रखने की कोशिश में लगा है। कांग्रेस ने AIUDF जैसे मुस्लिम-केंद्रित दल से दूरी बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि यह गठबंधन किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे असम के लिए है। लेकिन असली सवाल यही है—क्या यह संदेश जमीन तक पहुंचेगा?
अब असम की राजनीति एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ मजबूत संगठन और नेतृत्व के साथ भाजपा है, जो लगातार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ एकजुट विपक्ष है, जो बदलाव का नारा लेकर मैदान में उतरा है। यह मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक सोच का बन चुका है।
9 अप्रैल को होने वाला मतदान अब तय करेगा कि असम की जनता किस दिशा में जाना चाहती है। क्या लोग बदलाव के पक्ष में वोट देंगे या फिर हिमंत बिस्वा सरमा को एक और मौका देंगे? क्या महागठबंधन सच में वोटों को जोड़ पाएगा या फिर जमीनी हकीकत कुछ और ही होगी?
