महिला आरक्षण पर दिवाली से पहले बड़ा फैसला? संसद में फिर आएगा बिल, सरकार को चाहिए दो-तिहाई बहुमत
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर केंद्र सरकार फिर सक्रिय है। दिवाली से पहले संसद की बैठक बुलाने की संभावना है, लेकिन तारीख तय नहीं हुई। अप्रैल में जरूरी बहुमत नहीं मिलने से संविधान संशोधन बिल आगे नहीं बढ़ सका था।
Women's Reservation Bill: महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद की बैठक हो सकती है। जानिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत क्यों चाहिए और 33% आरक्षण कब लागू होगा।
प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर संसद की बैठक की संभावना, सरकार को विशेष बहुमत जुटाने की चुनौती।
महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा चुनावों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार फिर सक्रिय हो गई है। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद में दोबारा लाने की तैयारी पर चर्चा शुरू हुई है। संभावना जताई जा रही है कि सरकार दिवाली से पहले संसद की बैठक बुला सकती है।
हालांकि, अभी तक बैठक की आधिकारिक तारीख घोषित नहीं हुई है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत जुटाना है।
खबर में खास
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर दिवाली से पहले संसद की बैठक संभव।
अप्रैल 2026 में संबंधित संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका था।
सरकार क्षेत्रीय और छोटे दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है।
महिलाओं को 33% आरक्षण देने का कानून पहले से मौजूद है, लेकिन सीटों पर उसका वास्तविक क्रियान्वयन बाकी है।
दिवाली से पहले संसद की बैठक क्यों बुला सकती है सरकार?
केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर आगे बढ़ने के विकल्पों पर विचार कर रही है।
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हुआ था, लेकिन इसे राष्ट्रपति की ओर से औपचारिक रूप से सत्रावसित (Prorogue) नहीं किया गया है।
ऐसी स्थिति में सरकार के पास मौजूदा सत्र की अगली बैठक बुलाने का विकल्प मौजूद है।
रिपोर्टों के अनुसार, दिवाली से पहले दो से तीन दिनों की बैठक आयोजित करने की संभावना पर चर्चा है। हालांकि, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है।
संसद का शीतकालीन सत्र नवंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू होने की संभावना है।
अप्रैल में महिला आरक्षण से जुड़ा बिल क्यों नहीं हुआ पास?
17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेशों के कानूनों में संशोधन से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा हुई थी।
सरकार इन बदलावों के जरिए महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था का जल्द क्रियान्वयन करना चाहती थी।
लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को आवश्यक विशेष बहुमत नहीं मिला। इसके कारण उससे जुड़े दूसरे विधेयकों पर भी आगे कार्रवाई नहीं हुई।
सरकार ने इस स्थिति के लिए विपक्ष के विरोध को जिम्मेदार ठहराया था। वहीं, विपक्षी दलों ने परिसीमन की प्रक्रिया, राज्यों के प्रतिनिधित्व और प्रस्तावित व्यवस्था पर सवाल उठाए थे।
दो-तिहाई बहुमत क्यों जरूरी है?
संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए।
इसके तहत संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन जरूरी है।
उदाहरण के लिए, यदि लोकसभा में 540 सदस्य मतदान करते हैं, तो दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 वोट चाहिए होंगे।
हालांकि, वास्तविक आवश्यक संख्या उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर तय होती है। केवल सामान्य बहुमत से ऐसा संविधान संशोधन पारित नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि सरकार क्षेत्रीय और छोटे दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है।
महिलाओं को 33% आरक्षण कब मिलेगा?
संसद ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था।
इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की संवैधानिक व्यवस्था है।
लेकिन महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का वास्तविक निर्धारण जनगणना और परिसीमन से जुड़ी प्रक्रिया पर निर्भर है।
सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस व्यवस्था को लागू करने के उद्देश्य से आगे बढ़ रही है। हालांकि, इसके लिए आवश्यक कानूनी बदलाव अभी पूरे नहीं हुए हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अगला लोकसभा चुनाव निश्चित रूप से 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के साथ ही होगा।
परिसीमन पर राजनीतिक मतभेद क्यों हैं?
परिसीमन का मतलब जनसंख्या और अन्य निर्धारित मानदंडों के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व की समीक्षा करना है।
सरकार ने पहले लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। उसका तर्क है कि इससे बढ़ती आबादी को बेहतर प्रतिनिधित्व और महिलाओं के लिए अधिक अवसर मिलेंगे।
वहीं, कुछ विपक्षी दलों ने चिंता जताई है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा बदलने से राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
इसलिए विवाद सिर्फ महिला आरक्षण का नहीं, बल्कि नई संसदीय सीटों के वितरण का भी है।
अब आगे क्या होगा?
अक्टूबर में संसद की बैठक होगी या नहीं, इसका फैसला आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।
अगर सरकार विधेयकों को दोबारा पेश करती है, तो उनके नए प्रावधानों और राजनीतिक दलों के समर्थन पर नजर रहेगी।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या सरकार जरूरी विशेष बहुमत जुटा पाएगी और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की समयसीमा स्पष्ट हो पाएगी।