SIR के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाएं, ज्ञानेश कुमार के 14 आदेश रद्द करने और हटाए गए वोटरों के नाम लौटाने की मांग

याचिकाओं में महाराष्ट्र की मतदाता सूची से मनमाने तरीके से नाम हटाने और प्रभावित लोगों को सुनवाई का मौका नहीं देने का आरोप लगाया गया है। महाराष्ट्र में SIR रोकने की मांग भी की गई है।

महाराष्ट्र में SIR के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट और उसकी कोल्हापुर सर्किट बेंच में दो याचिकाएं दाखिल हुई हैं। इनमें CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों को रद्द करने और हटाए गए मतदाताओं के नाम सूची में बहाल करने की मांग की गई है।

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महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल कर हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की गई है।

चुनाव आयोग पर जारी विवाद अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र में SIR रोकने, हटाए गए मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने और CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 आदेशों को रद्द करने की मांग वाली दो याचिकाएं बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हुई हैं।

 

प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 25 सितंबर 2026

खबर में खास

  • SIR के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाएं
  • CEC से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों को चुनौती
  • हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग
  • बिना सुनवाई नाम काटने का लगाया गया आरोप
  • महाराष्ट्र में SIR रोकने की भी मांग
मुंबई। महाराष्ट्र में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR का विवाद अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। SIR की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट और उसकी कोल्हापुर सर्किट बेंच में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
याचिकाओं में मतदाता सूची से मनमाने तरीके से नाम हटाने, प्रभावित मतदाताओं को सुनवाई का उचित अवसर नहीं देने और चुनाव आयोग की प्रक्रिया में गड़बड़ी होने के आरोप लगाए गए हैं।

Challenge To 14 Administrative Orders

कोल्हापुर सर्किट बेंच में महाराष्ट्र के तीन निवासियों की ओर से वकील असीम सरोदे ने एक याचिका दाखिल की है। इसमें पिछले लगभग 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों एवं कार्रवाइयों को रद्द करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने उस रिपोर्ट का भी उल्लेख किया है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने तथा Electoral Roll Database से जुड़े फैसलों पर सवाल या आपत्तियां उठाई थीं।
हालांकि चुनाव आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि उसके अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए और किसी आयुक्त ने औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई।

Demand To Stop SIR In Maharashtra

याचिका में अदालत से महाराष्ट्र में चल रही SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग से संबंधित 2023 के कानून के Section 18 के तहत अपनी जिम्मेदारी का सही तरीके से पालन नहीं किया।
यह याचिकाकर्ताओं का कानूनी दावा है, जिस पर चुनाव आयोग का जवाब और अदालत का फैसला आना बाकी है।

Deleted Names Should Be Restored

याचिका में मांग की गई है कि महाराष्ट्र में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए सभी लोगों के नाम दोबारा शामिल किए जाएं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी योग्य नागरिक को उचित जांच और सुनवाई के बिना मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
दूसरी याचिका में Booth Level Officers और संबंधित अधिकारियों पर मनमाने तरीके से काम करने का आरोप लगाया गया है। दावा है कि कई मतदाताओं के नाम सूची से हटाने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर नहीं मिला।

What Is The Election Commission’s Stand?

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित, दोहरे पंजीकरण और अपात्र नाम हटाकर सूची को सही बनाना है। आयोग के अनुसार, योग्य मतदाताओं को नाम जोड़ने और नाम हटाए जाने के खिलाफ आपत्ति एवं अपील करने की सुविधा उपलब्ध है।
आयोग विपक्ष के उन आरोपों को भी खारिज करता रहा है, जिनमें SIR के जरिए किसी खास राजनीतिक दल या मतदाता वर्ग को निशाना बनाने का दावा किया गया है।

High Court Has Not Passed Any Order Yet

दोनों याचिकाएं अदालत में दाखिल हो गई हैं, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभी महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने या हटाए गए सभी मतदाताओं के नाम बहाल करने का कोई आदेश नहीं दिया है।
मामले पर 28 सितंबर के आसपास सुनवाई होने की संभावना जताई जा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत चुनाव आयोग से जवाब मांग सकती है और याचिकाओं में लगाए गए आरोपों एवं उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच करेगी।

बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल दोनों याचिकाओं ने महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया को बड़ी कानूनी चुनौती दे दी है। अब अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि मतदाता सूची की सफाई और योग्य नागरिकों के मतदान अधिकार के बीच संतुलन बना या बिना पर्याप्त सुनवाई बड़ी संख्या में नाम हटा दिए गए।

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