जयति भारतम: दिव्यांग बच्चों के जीवन-यात्रा के सारथी, हजरतगंज जू भ्रमण ने भरी नई ऊर्जा
दिव्यांगजनों के लिए एकीकृत शिक्षा और समग्र विकास का माध्यम
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संस्था ने बच्चों को लखनऊ के हजरतगंज स्थित चिड़ियाघर का भ्रमण कराया
उत्तर प्रदेश की एकमात्र ऐसी संस्था जयति भारतम, जो देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले दिव्यांगजनों के लिए एकीकृत शिक्षा और समग्र विकास का माध्यम बनी हुई है, ने एक बार फिर अपनी संवेदनशीलता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। रविवार को संस्था के बच्चों को लखनऊ के हजरतगंज स्थित चिड़ियाघर ले जाकर न केवल उनके शारीरिक और मानसिक विकास को बढ़ावा दिया, बल्कि यह साबित कर दिया कि दिव्यांगता कोई बाधा नहीं, बल्कि जीवन को समृद्ध करने का एक अनोखा माध्यम है। संस्था के संस्थापक ने इस आयोजन को दिव्यांग बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि "हम उनके जीवन-यात्रा के सारथी हैं, जो उन्हें न केवल साक्षर बनाते हैं, बल्कि सशक्त और आत्मनिर्भर भी।"
जयति भारतम की स्थापना वर्ष 2007 में हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के 25 दिव्यांग और बहु-विकलांग छात्रों के लिए शिक्षा, पुनर्वास और समग्र विकास की शुरुआत की गई। आज यह संस्था देशभर से आने वाले सैकड़ों दिव्यांगजनों को अपने आवासीय परिसर में निःशुल्क आवास, भोजन और शिक्षा प्रदान कर रही है। यहां विशेष शिक्षक केंद्र-आधारित और घर-आधारित सेवाओं के माध्यम से बच्चों के शारीरिक सुधार, शैक्षणिक प्रगति, सशक्तिकरण, आध्यात्मिक बल और सामाजिक मूल्यों के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। संस्था का उद्देश्य स्पष्ट है—दिव्यांगजनों को सम्मान दिलाना, उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना और राष्ट्र-निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
रविवार का यह जू भ्रमण विशेष रूप से प्रेरणादायक रहा, खासकर उन अंधे बच्चों के लिए जो दृष्टि से वंचित हैं, लेकिन संवेदनाओं की दुनिया में समृद्ध हैं। संस्था के एक दृष्टिहीन छात्र, 12 वर्षीय राहुल ने उत्साह से कहा, "हम जू को देख तो नहीं सकते, लेकिन महसूस अवश्य कर सकते हैं। शेर की दहाड़ सुनकर दिल धड़क उठा, हाथी की सूंड छूकर उसके विशाल स्वरूप की कल्पना कर ली, और पक्षियों की चहचहाहट ने हमें स्वतंत्रता का अहसास कराया। यह यात्रा हमें सिखाती है कि दिव्यांगता हमें रोक नहीं सकती, बल्कि नई संभावनाओं के द्वार खोलती है।" इसी तरह, एक अन्य छात्रा प्रिया ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए बताया, "जू में चलते हुए हवा की सनसनाहट और जानवरों की गंध ने हमें एक नई दुनिया में ले जाकर जीवंत कर दिया। हमारी आंखें भले बंद हों, लेकिन दिल और दिमाग हमेशा खुला रहता है।"
इस आयोजन के दौरान संस्था के संस्थापक राजेंद्र कांत अग्निहोत्री ने अपनी संतुष्टि जाहिर की। उन्होंने कहा, "जयति भारतम एक सारथी की भांति दिव्यांगजनों की जीवन-यात्रा में सहायता सुनिश्चित कर रहा है। हम उन्हें केवल शिक्षित नहीं, बल्कि साक्षर और सक्षम बनाते हैं, ताकि वे अपनी क्षमताओं से रोजगार प्राप्त कर सकें और समाज का अभिन्न अंग बन सकें। ऐसे आयोजन उनके व्यक्तित्व को निखारते हैं, उन्हें आत्मविश्वास देते हैं। संस्था के अपने संसाधनों से हम यह सब संभव बना रहे हैं, और भविष्य में और अधिक अवसर प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"
यह भ्रमण न केवल बच्चों के लिए एक मनोरंजक अनुभव था, बल्कि समाज को एक सकारात्मक संदेश भी दे गया—दिव्यांग बच्चे किसी दया के पात्र नहीं, बल्कि वे राष्ट्र के भविष्य के स्तंभ हैं। जयती भारतम जैसी संस्थाओं की भूमिका यहां अहम है, जो बाधाओं को अवसरों में बदल रही हैं। यदि समाज मिलकर ऐसे प्रयासों का समर्थन करे, तो दिव्यांगजनों का योगदान देश के विकास में और भी उल्लेखनीय होगा। यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब हम सबकी क्षमताओं को पहचानें और उन्हें पंख दें।
जयति भारतम की स्थापना वर्ष 2007 में हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के 25 दिव्यांग और बहु-विकलांग छात्रों के लिए शिक्षा, पुनर्वास और समग्र विकास की शुरुआत की गई। आज यह संस्था देशभर से आने वाले सैकड़ों दिव्यांगजनों को अपने आवासीय परिसर में निःशुल्क आवास, भोजन और शिक्षा प्रदान कर रही है। यहां विशेष शिक्षक केंद्र-आधारित और घर-आधारित सेवाओं के माध्यम से बच्चों के शारीरिक सुधार, शैक्षणिक प्रगति, सशक्तिकरण, आध्यात्मिक बल और सामाजिक मूल्यों के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। संस्था का उद्देश्य स्पष्ट है—दिव्यांगजनों को सम्मान दिलाना, उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना और राष्ट्र-निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
रविवार का यह जू भ्रमण विशेष रूप से प्रेरणादायक रहा, खासकर उन अंधे बच्चों के लिए जो दृष्टि से वंचित हैं, लेकिन संवेदनाओं की दुनिया में समृद्ध हैं। संस्था के एक दृष्टिहीन छात्र, 12 वर्षीय राहुल ने उत्साह से कहा, "हम जू को देख तो नहीं सकते, लेकिन महसूस अवश्य कर सकते हैं। शेर की दहाड़ सुनकर दिल धड़क उठा, हाथी की सूंड छूकर उसके विशाल स्वरूप की कल्पना कर ली, और पक्षियों की चहचहाहट ने हमें स्वतंत्रता का अहसास कराया। यह यात्रा हमें सिखाती है कि दिव्यांगता हमें रोक नहीं सकती, बल्कि नई संभावनाओं के द्वार खोलती है।" इसी तरह, एक अन्य छात्रा प्रिया ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए बताया, "जू में चलते हुए हवा की सनसनाहट और जानवरों की गंध ने हमें एक नई दुनिया में ले जाकर जीवंत कर दिया। हमारी आंखें भले बंद हों, लेकिन दिल और दिमाग हमेशा खुला रहता है।"
इस आयोजन के दौरान संस्था के संस्थापक राजेंद्र कांत अग्निहोत्री ने अपनी संतुष्टि जाहिर की। उन्होंने कहा, "जयति भारतम एक सारथी की भांति दिव्यांगजनों की जीवन-यात्रा में सहायता सुनिश्चित कर रहा है। हम उन्हें केवल शिक्षित नहीं, बल्कि साक्षर और सक्षम बनाते हैं, ताकि वे अपनी क्षमताओं से रोजगार प्राप्त कर सकें और समाज का अभिन्न अंग बन सकें। ऐसे आयोजन उनके व्यक्तित्व को निखारते हैं, उन्हें आत्मविश्वास देते हैं। संस्था के अपने संसाधनों से हम यह सब संभव बना रहे हैं, और भविष्य में और अधिक अवसर प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"
यह भ्रमण न केवल बच्चों के लिए एक मनोरंजक अनुभव था, बल्कि समाज को एक सकारात्मक संदेश भी दे गया—दिव्यांग बच्चे किसी दया के पात्र नहीं, बल्कि वे राष्ट्र के भविष्य के स्तंभ हैं। जयती भारतम जैसी संस्थाओं की भूमिका यहां अहम है, जो बाधाओं को अवसरों में बदल रही हैं। यदि समाज मिलकर ऐसे प्रयासों का समर्थन करे, तो दिव्यांगजनों का योगदान देश के विकास में और भी उल्लेखनीय होगा। यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब हम सबकी क्षमताओं को पहचानें और उन्हें पंख दें।
