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                <title>ओवैसी की यूपी एंट्री पर उलेमा से टकराव क्यों? फिरंगी महली के बयान के बाद AIMIM समर्थकों का पलटवार</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले AIMIM अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में है। इसी बीच मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को लेकर पार्टी और कुछ प्रमुख उलेमा के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। कानपुर रैली के बाद मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/state/uttar-pradesh/owaisi-aimim-firangi-mahali-ulama-muslim-leadership-up-election-2027/article-2194"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/owaisi-firangi-mahali-ulama-up-election-2027.jpg2.jpg" alt=""></a><br /><h1><span><strong>यूपी चुनाव से पहले मुस्लिम नेतृत्व पर नई बहस, सियासत और उलेमा आमने-सामने</strong></span></h1>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/owaisi-firangi-mahali-ulama-up-election-2027.jpg2.jpg" alt="owaisi-firangi-mahali-ulama-up-election-2027.jpg2" width="1366" height="768"></img>
यूपी चुनाव 2027 से पहले असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति और मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली के बयान ने मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

<p><span><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | उत्तर प्रदेश डेस्क | 25 सितंबर 2026</strong></span></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li>
<h6><strong>कानपुर में ओवैसी की रैली के बाद फिरंगी महली ने धार्मिक ध्रुवीकरण से बचने की अपील की</strong></h6>
</li>
<li>
<h6><strong>उन्होंने कहा—यूपी का मुस्लिम मतदाता विकास के मुद्दे पर फैसला करेगा</strong></h6>
</li>
<li>
<h6><strong>AIMIM नेताओं ने उनके बयान का विरोध किया</strong></h6>
</li>
<li>
<h6><strong>इससे पहले सज्जाद नोमानी और महमूद मदनी से भी AIMIM समर्थकों का विवाद हो चुका है</strong></h6>
</li>
<li>
<h6><strong>बहस के केंद्र में सवाल—मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व किसके हाथ में और किस रास्ते से आगे बढ़े?</strong></h6>
</li>
</ul>
<h6><strong>लखनऊ।</strong> उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच मुस्लिम राजनीति में एक अलग बहस तेज होती दिख रही है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी प्रदेश में लगातार रैलियां कर रहे हैं और मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठा रहे हैं। इसी दौरान पार्टी के नेताओं और कुछ प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं के बीच सार्वजनिक मतभेद सामने आए हैं।</h6>
<h6>ताजा विवाद लखनऊ के ऐशबाग ईदगाह के इमाम और इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली के बयान के बाद शुरू हुआ है। फिरंगी महली ने ओवैसी की कानपुर रैली के बाद कहा था कि चुनावी राजनीति को धार्मिक आधार पर बांटने से बचना चाहिए।</h6>
<h2><span><strong>फिरंगी महली ने क्या कहा था?</strong></span></h2>
<h6>मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और प्रदेश में मुस्लिम सांसद और विधायक पहले से मौजूद हैं।</h6>
<h6>उन्होंने यह भी कहा कि मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं को भड़काने के बजाय विकास के मुद्दों पर राजनीति होनी चाहिए। उनके मुताबिक यूपी का मुस्लिम मतदाता केवल भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि अपने मुद्दों को देखकर मतदान करेगा।</h6>
<h6>उनकी यह टिप्पणी ओवैसी की कानपुर रैली के बाद आई थी, जहां AIMIM प्रमुख ने मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रदेश की राजनीति में समुदाय की भूमिका का मुद्दा उठाया था।</h6>
<h2><span><strong>AIMIM नेताओं ने क्यों जताई नाराजगी?</strong></span></h2>
<h6>फिरंगी महली के बयान के बाद AIMIM से जुड़े नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना की।</h6>
<h6>यूपी AIMIM नेता मुफ्ती मोहम्मद ओसामा नदवी ने आजतक से कहा कि उनकी पार्टी उलेमा का सम्मान करती है, लेकिन जो धर्मगुरु राजनीतिक टिप्पणी करेंगे, उनके बयानों की आलोचना भी की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक नेता स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व की कोशिशों का विरोध करते हैं। यह AIMIM नेता का राजनीतिक दावा है।</h6>
<h6>नदवी ने यह भी कहा कि AIMIM की कोशिश मुस्लिम समाज की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज खड़ी करने की है। उनके अनुसार मुख्यधारा के दलों ने लंबे समय तक मुस्लिम मतदाताओं को वोट बैंक की तरह देखा है। यह AIMIM का राजनीतिक पक्ष है, जिसे अन्य दल और धार्मिक नेता अलग नजरिए से देखते हैं।</h6>
<h2><span><strong>सज्जाद नोमानी से भी क्यों हुआ था विवाद?</strong></span></h2>
<h6>मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली से पहले मौलाना सज्जाद नोमानी भी AIMIM नेताओं और समर्थकों की आलोचना का सामना कर चुके हैं।</h6>
<h6>आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान नोमानी ने महा विकास अघाड़ी के उम्मीदवारों के समर्थन में अपील की थी। AIMIM समर्थकों ने आरोप लगाया था कि इस राजनीतिक रुख से उनकी पार्टी को नुकसान हुआ। बाद में ओवैसी और AIMIM नेता इम्तियाज जलील ने भी नोमानी के राजनीतिक रुख की आलोचना की थी।</h6>
<h6>हालांकि किसी उम्मीदवार की हार को केवल एक अपील या किसी एक समुदाय के वोटों से जोड़ना सरल निष्कर्ष होगा; चुनाव परिणाम कई स्थानीय और राजनीतिक कारणों से प्रभावित होते हैं।</h6>
<h2><span><strong>महमूद मदनी और ओवैसी के बीच क्या विवाद रहा?</strong></span></h2>
<h6>जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महमूद मदनी भी ओवैसी की राजनीति की आलोचना करते रहे हैं।</h6>
<h6>रिपोर्ट के मुताबिक मदनी ने एक पॉडकास्ट में ओवैसी की राजनीतिक विचारधारा से असहमति जताई और कहा कि उनकी राजनीति से समाज में विभाजन बढ़ सकता है। उन्होंने ओवैसी की रैलियों में जुटने वाली भीड़ को लेकर भी तीखी टिप्पणी की थी। इसके बाद AIMIM समर्थकों ने मदनी की आलोचना की।</h6>
<h6>यहां दोनों पक्षों के राजनीतिक दृष्टिकोण अलग हैं—मदनी ओवैसी की शैली और राजनीति पर सवाल उठाते हैं, जबकि AIMIM का कहना है कि वह मुस्लिम समुदाय के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात कर रही है।</h6>
<h2><span><strong>ओवैसी यूपी में किस रणनीति के साथ उतर रहे हैं?</strong></span></h2>
<h6>AIMIM ने उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ाई हैं। ओवैसी ने कानपुर में सभा की और पार्टी की आगे श्रावस्ती तथा आजमगढ़ जैसे इलाकों में भी कार्यक्रम करने की योजना सामने आई है।</h6>
<h6>ओवैसी ने हाल में यह भी कहा है कि BJP को तीसरी बार सरकार बनाने से रोकने के लिए वह समान विचार रखने वाले दलों से गठबंधन की बातचीत के लिए तैयार हैं। साथ ही उन्होंने सपा समेत दूसरे विपक्षी दलों की राजनीति पर भी सवाल उठाए हैं।</h6>
<h6>यह गठबंधन होगा या नहीं और किन दलों के साथ होगा, इस पर अभी अंतिम स्थिति सामने नहीं आई है।</h6>
<h2><span><strong>असली विवाद मुस्लिम नेतृत्व को लेकर है?</strong></span></h2>
<h6>मौजूदा बहस केवल किसी एक बयान तक सीमित नहीं दिखती।</h6>
<h6>AIMIM का राजनीतिक तर्क है कि मुसलमानों को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत और नेतृत्व विकसित करना चाहिए। दूसरी तरफ फिरंगी महली जैसे धर्मगुरु यह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व पहले से मौजूद है और चुनाव को धार्मिक आधार पर बांटने से बचना चाहिए।</h6>
<h6>यानी मतभेद दो सवालों पर केंद्रित है—मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह होना चाहिए और धर्मगुरुओं की चुनावी राजनीति में कितनी भूमिका होनी चाहिए।</h6>
<h2><span><strong>यूपी चुनाव से पहले क्यों बढ़ी यह बहस?</strong></span></h2>
<h6>उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी सामाजिक और राजनीतिक रणनीति पर काम कर रहे हैं। AIMIM भी उन क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रही है जहां मुस्लिम आबादी महत्वपूर्ण है।</h6>
<h6>ऐसे में ओवैसी की राजनीति पर किसी प्रमुख धर्मगुरु की टिप्पणी और उस पर AIMIM नेताओं की प्रतिक्रिया केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं रह जाती, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बड़ी बहस का हिस्सा बन जाती है।</h6>
<h6>इसके बावजूद यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस बहस का मतदाताओं के व्यवहार या चुनाव परिणाम पर क्या असर पड़ेगा।</h6>
<h6><strong>फिरंगी महली, सज्जाद नोमानी और महमूद मदनी से AIMIM समर्थकों के अलग-अलग विवादों के पीछे एक साझा सवाल दिखाई देता है—मुस्लिम समाज की राजनीतिक आवाज किस रूप में आगे बढ़े। AIMIM स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व की बात कर रही है, जबकि कई उलेमा धार्मिक पहचान के आधार पर चुनावी ध्रुवीकरण से बचने पर जोर दे रहे हैं। यूपी चुनाव करीब आने के साथ यह वैचारिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है, लेकिन मतदाता किस राजनीतिक रास्ते को चुनेंगे इसका फैसला आखिर चुनाव में ही होगा।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तरप्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 16:52:37 +0530</pubDate>
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