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                <title>Cycle Symbol - Pratyakshdarshi Samachar</title>
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                <title>जब सपा में हुई थी टूट तो अखिलेश यादव को कैसे मिली ‘साइकिल’? मुलायम गुट से विवाद पर EC ने ऐसे किया था फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[TMC के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर जारी विवाद के बीच 2017 का समाजवादी पार्टी विवाद फिर चर्चा में है। उस समय मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के गुटों ने पार्टी पर दावा किया था। चुनाव आयोग ने विधायकों, सांसदों और पार्टी संगठन में समर्थन से जुड़े दस्तावेजों पर विचार करने के बाद अखिलेश गुट को समाजवादी पार्टी और ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह का अधिकार दिया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/state/uttar-pradesh/akhilesh-yadav-sp-cycle-symbol-election-commission-2017/article-2091"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/akhilesh-mulayam-sp-cycle-symbol-dispute-2017.jpg2.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | लखनऊ | 18 सितंबर 2026</strong></p>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/akhilesh-mulayam-sp-cycle-symbol-dispute-2017.jpg2.jpg" alt="akhilesh-mulayam-sp-cycle-symbol-dispute-2017.jpg2" width="1366" height="768"></img>
2017 में चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को समाजवादी पार्टी और ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह का अधिकार दिया था।

<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>2017 में दो गुटों में बंट गई थी समाजवादी पार्टी</strong></li>
<li><strong>मुलायम और अखिलेश दोनों पक्षों में हुआ था नेतृत्व विवाद</strong></li>
<li><strong>चुनाव आयोग तक पहुंचा था पार्टी और ‘साइकिल’ का मामला</strong></li>
<li><strong>EC ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को माना था समाजवादी पार्टी</strong></li>
</ul>
<h6>पश्चिम बंगाल में TMC के दो गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद के बाद पुराने राजनीतिक दलों के ऐसे मामलों की चर्चा फिर शुरू हो गई है।</h6>
<h6>ऐसा ही एक बड़ा मामला उत्तर प्रदेश में <strong>2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी</strong> में सामने आया था। उस समय एक तरफ पार्टी संस्थापक <strong>मुलायम सिंह यादव</strong> थे और दूसरी तरफ तत्कालीन मुख्यमंत्री <strong>अखिलेश यादव</strong>। विवाद इतना बढ़ा कि पार्टी के नाम और प्रसिद्ध <strong>‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह</strong> का मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया।</h6>
<h2>कैसे शुरू हुआ मुलायम-अखिलेश विवाद?</h2>
<h6>2016 के आखिर में समाजवादी पार्टी के अंदर नेतृत्व और विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए।</h6>
<h6>30 दिसंबर 2016 को मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा कर दी थी। हालांकि बाद में अखिलेश का निष्कासन वापस ले लिया गया।</h6>
<h6>इसके बाद 1 जनवरी 2017 को लखनऊ में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया। मुलायम सिंह यादव को संरक्षक बनाने का प्रस्ताव रखा गया। मुलायम सिंह ने इस अधिवेशन को वैध नहीं माना था।</h6>
<h6>यहीं से पार्टी के वास्तविक नियंत्रण का विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा।</h6>
<h2>चुनाव आयोग के सामने क्या था सवाल?</h2>
<h6>चुनाव आयोग को मुख्य रूप से दो चीजें तय करनी थीं—क्या समाजवादी पार्टी वास्तव में दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में विभाजित हो गई है और, अगर हां, तो दोनों में से किस गुट को चुनाव चिन्ह आदेश के तहत समाजवादी पार्टी माना जाए।</h6>
<h6>EC के आदेश में एक गुट का नेतृत्व <strong>अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव</strong>, जबकि दूसरे का नेतृत्व <strong>मुलायम सिंह यादव</strong> कर रहे थे। आयोग ने माना कि पार्टी में दो प्रतिद्वंद्वी गुट अस्तित्व में आ चुके थे।</h6>
<h2>अखिलेश यादव का दावा कैसे मजबूत हुआ?</h2>
<h6>अखिलेश गुट ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों और संगठन में अपने समर्थन से जुड़े दस्तावेज और हलफनामे पेश किए थे।</h6>
<h6>आयोग के आदेश के मुताबिक अखिलेश गुट ने लोकसभा सांसदों, राज्यसभा सांसदों, विधायकों, विधान परिषद सदस्यों, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न श्रेणियों में <strong>करीब 90% समर्थन</strong> का दावा दस्तावेजों के जरिए पेश किया था।</h6>
<h6>इसके बाद 16 जनवरी 2017 को चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को समाजवादी पार्टी के रूप में मान्यता दी और <strong>‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह भी उसी गुट को मिला।</strong></h6>
<h2>क्या सिर्फ बहुमत देखकर मिलता है चुनाव चिन्ह?</h2>
<h6>इसे इतना सरल समझना ठीक नहीं होगा कि हर पार्टी विवाद में केवल ज्यादा विधायक या सांसद वाला गुट स्वतः पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह हासिल कर लेता है।</h6>
<h6>मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के मामले में चुनाव आयोग <strong>Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के Paragraph 15</strong> के तहत उपलब्ध तथ्य और परिस्थितियों पर विचार कर सकता है। 2017 के सपा मामले में आयोग ने संगठन और विधायी विंग में समर्थन से जुड़े साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना था।</h6>
<h6>इसलिए 2017 के सपा फैसले को किसी दूसरे दल के विवाद का स्वतः परिणाम नहीं माना जा सकता।</h6>
<h2>अब TMC मामले से क्यों हो रही तुलना?</h2>
<h6>मौजूदा TMC विवाद में भी प्रतिद्वंद्वी गुट पार्टी की पहचान को लेकर आमने-सामने हैं। इसी वजह से 2017 के सपा विवाद जैसे पुराने मामलों की चर्चा हो रही है।</h6>
<h6>लेकिन दोनों मामलों के तथ्य अलग हैं। TMC विवाद में चुनाव आयोग ने अभी अंतरिम व्यवस्था के तहत पुराने पार्टी नाम और ‘Flowers and Grass’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगाकर दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए अस्थायी अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए हैं।</h6>
<h6>इसलिए <strong>“अखिलेश को साइकिल मिली थी, इसलिए TMC में भी किसी खास गुट को पुराना चिन्ह मिलेगा”</strong> जैसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। अंतिम फैसला संबंधित मामले में आयोग के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड और दावों पर निर्भर करेगा।</h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तरप्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Sep 2026 18:07:17 +0530</pubDate>
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