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                <title>UCC Explained - Pratyakshdarshi Samachar</title>
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                <description>UCC Explained RSS Feed</description>
                
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                <title>UCC पर संसद की बजाय ‘स्टेट रूट’ क्यों अपना रही BJP? 2029 से पहले NDA राज्यों में लागू करने की तैयारी</title>
                                    <description><![CDATA[समान नागरिक संहिता यानी UCC BJP के लंबे समय से चले आ रहे प्रमुख वैचारिक मुद्दों में शामिल है। लेकिन पार्टी इसे सीधे संसद से पूरे देश में लागू करने के बजाय राज्य-दर-राज्य आगे बढ़ा रही है। अमित शाह ने 2029 से पहले सभी NDA-शासित राज्यों में UCC लागू करने की बात कही है। इसके पीछे संविधान की समवर्ती सूची, अलग-अलग राज्यों की सामाजिक और आदिवासी विविधता, सहयोगी दलों की आपत्तियां और राज्य स्तर पर कानून को पहले परखने की रणनीति अहम मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/why-bjp-ucc-state-route-not-parliament-2029-explained/article-2027"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/bjp-ucc-state-route-parliament-amit-shah-2029-explained.jpg-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 14 सितंबर 2026</strong></p>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/bjp-ucc-state-route-parliament-amit-shah-2029-explained.jpg-(2).jpg" alt="bjp-ucc-state-route-parliament-amit-shah-2029-explained.jpg (2)" width="1366" height="768"></img>
BJP UCC को सीधे संसद से लागू करने के बजाय राज्य-दर-राज्य आगे बढ़ाने की रणनीति अपना रही है।

<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>अमित शाह का लक्ष्य- 2029 से पहले NDA शासित राज्यों में UCC</strong></li>
<li><strong>संसद के बजाय राज्य-दर-राज्य कानून बनाने पर BJP का जोर</strong></li>
<li><strong>विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची से जुड़े</strong></li>
<li><strong>आदिवासी परंपराएं और सहयोगी दलों की आपत्तियां बड़ी चुनौती</strong></li>
</ul>
<h6>समान नागरिक संहिता यानी <strong>Uniform Civil Code (UCC)</strong> BJP के सबसे पुराने और बड़े वैचारिक मुद्दों में से एक रही है।</h6>
<h6>राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के बाद अब UCC को पार्टी अपने अगले बड़े एजेंडे के रूप में आगे बढ़ा रही है।</h6>
<h6>लेकिन यहां एक अहम सवाल उठता है—अगर लक्ष्य पूरे देश में एक समान नागरिक कानून लागू करना है, तो BJP सीधे संसद में केंद्रीय कानून क्यों नहीं ला रही?</h6>
<h6>इसके बजाय पार्टी राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने का रास्ता क्यों चुन रही है?</h6>
<h6>यही इस पूरी रणनीति का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।</h6>
<h2>अमित शाह ने क्या कहा?</h2>
<h6>केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को मुंबई में कहा कि <strong>2029 लोकसभा चुनाव से पहले BJP नेतृत्व वाले सभी 21 NDA-शासित राज्यों में UCC लागू करने की योजना है।</strong></h6>
<h6>इस बयान से साफ है कि फिलहाल केंद्र की रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर एक ही कानून लाने से पहले राज्य स्तर पर इसे फैलाने की है।</h6>
<h2>संसद से सीधे UCC क्यों नहीं?</h2>
<h6>इसकी पहली वजह संवैधानिक ढांचा है।</h6>
<h6>विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानून जैसे कई विषय संविधान की <strong>समवर्ती सूची</strong> से जुड़े हैं।</h6>
<h6>इसका मतलब है कि इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।</h6>
<h6>इसी वजह से BJP राज्यों को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल कर सकती है, जहां अलग-अलग मॉडल लागू कर उनके कानूनी और सामाजिक प्रभाव को परखा जा सके।</h6>
<h2>अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक ढांचा</h2>
<h6>भारत की सामाजिक संरचना एक जैसी नहीं है।<br />उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सामाजिक, धार्मिक और जनजातीय परिस्थितियां अलग-अलग हैं।<br />कई राज्यों में आदिवासी समुदायों की विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक परंपराएं मुख्यधारा के निजी कानूनों से अलग हैं।<br />इसी वजह से कई राज्य UCC कानूनों में अनुसूचित जनजातियों को छूट दे रहे हैं।<br />यानी एक ही राष्ट्रीय कानून तुरंत लागू करना कानूनी और सामाजिक विवाद बढ़ा सकता है।</h6>
<h2>राज्य मॉडल से BJP को क्या फायदा?</h2>
<h6>राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने से BJP को कई रणनीतिक फायदे मिलते हैं।</h6>
<h6>पहला, कानून को छोटे स्तर पर परखा जा सकता है।</h6>
<h6>दूसरा, अदालतों में चुनौती आने पर कानूनी खामियों को समझा जा सकता है।</h6>
<h6>तीसरा, दूसरे राज्यों के लिए पहले से लागू मॉडल उदाहरण बन सकते हैं।</h6>
<h6>और चौथा, राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सहमति बनाने के लिए समय मिल जाता है।</h6>
<h2>कौन-कौन से राज्य आगे बढ़ चुके हैं?</h2>
<h6>उत्तराखंड ने UCC लागू करने में सबसे पहले बड़ा कदम उठाया।</h6>
<h6>इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने भी अपने-अपने स्तर पर UCC से जुड़े कानून या विधेयक आगे बढ़ाए हैं।</h6>
<h6>इसके अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी समितियां या मसौदा प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।</h6>
<h2>क्या सभी राज्यों का UCC एक जैसा है?</h2>
<h6>नहीं।</h6>
<h6>यही इस पूरी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।</h6>
<h6>अलग-अलग राज्यों के UCC में कई समान प्रावधान हो सकते हैं, जैसे विवाह पंजीकरण, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े नियम।</h6>
<h6>लेकिन स्थानीय परिस्थितियों के कारण अपवाद और छूट अलग हो सकती हैं।</h6>
<h6>उदाहरण के लिए आदिवासी समुदायों को कुछ राज्यों में UCC से बाहर रखा गया है।</h6>
<h6>इसलिए फिलहाल UCC का अर्थ वास्तव में “हर राज्य में बिल्कुल एक जैसा कानून” नहीं है।</h6>
<h2>सहयोगी दल भी हैं बड़ी वजह</h2>
<h6>BJP इस समय केंद्र में NDA गठबंधन के साथ सरकार चला रही है।</h6>
<h6>UCC पर BJP के सभी सहयोगी दलों की राय एक जैसी नहीं है।</h6>
<h6>JD(U) और TDP जैसे दल पहले भी UCC पर व्यापक सहमति और परामर्श की जरूरत पर जोर दे चुके हैं।</h6>
<h6>ऐसी स्थिति में सीधे संसद में राष्ट्रीय UCC कानून लाना राजनीतिक रूप से ज्यादा कठिन हो सकता है।</h6>
<h6>राज्यों के रास्ते आगे बढ़ने से BJP को सहयोगियों पर तत्काल दबाव डाले बिना अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का मौका मिलता है।</h6>
<h2>अनुच्छेद 44 क्या कहता है?</h2>
<h6>भारतीय संविधान के <strong>अनुच्छेद 44</strong> में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है।</h6>
<h6>लेकिन यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल है।</h6>
<h6>यानी यह सरकार पर अदालत में लागू कराने योग्य बाध्यकारी आदेश नहीं है।</h6>
<h6>इसी वजह से UCC दशकों से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है।</h6>
<h2>विधि आयोग का क्या रुख रहा?</h2>
<h6>2018 में विधि आयोग ने कहा था कि उस समय UCC न तो जरूरी था और न ही वांछनीय।</h6>
<h6>बाद में 2023 में इस मुद्दे पर फिर से सुझाव मांगे गए।</h6>
<h6>इससे यह साफ होता है कि UCC को लेकर कानूनी बहस लगातार बदलती रही है और राष्ट्रीय स्तर पर अंतिम मॉडल पर अभी भी व्यापक सहमति नहीं बनी है।</h6>
<h2>विपक्ष क्यों कर रहा विरोध?</h2>
<h6>विपक्षी दलों और AIMIM जैसे संगठनों का तर्क है कि UCC भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता पर असर डाल सकता है।</h6>
<h6>असदुद्दीन ओवैसी ने अमित शाह के 2029 वाले बयान के बाद आरोप लगाया कि UCC के जरिए मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।</h6>
<h6>BJP इस आरोप को खारिज करती है और UCC को समान नागरिक अधिकारों, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों से जोड़ती है।</h6>
<h2>क्या 2029 तक पूरे देश में UCC लागू हो जाएगा?</h2>
<h6>अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा।</h6>
<h6>अमित शाह ने 2029 से पहले <strong>NDA-शासित राज्यों</strong> में UCC लागू करने का लक्ष्य बताया है, पूरे देश के लिए एक केंद्रीय UCC कानून की समयसीमा नहीं दी गई है।</h6>
<h6>इसका मतलब है कि गैर-NDA राज्यों में स्थिति अलग रह सकती है।</h6>
<h2>BJP की रणनीति क्या संकेत देती है?</h2>
<h6>राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने की रणनीति से तीन बातें साफ दिखाई देती हैं।</h6>
<h6>पहली, BJP अपने वैचारिक एजेंडे से पीछे नहीं हट रही।</h6>
<h6>दूसरी, वह सीधे एक बड़े राष्ट्रीय टकराव के बजाय चरणबद्ध मॉडल अपना रही है।</h6>
<h6>तीसरी, राज्य स्तर के कानून भविष्य में किसी राष्ट्रीय UCC की बुनियाद बन सकते हैं।</h6>
<h6>यानी फिलहाल <strong>‘एक देश, एक कानून’ का रास्ता एक ही बार में संसद से नहीं, बल्कि कई राज्यों से होकर गुजरता दिखाई दे रहा है।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 18:23:31 +0530</pubDate>
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