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                <title>राष्ट्रीय - Pratyakshdarshi Samachar</title>
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                            <item>
                <title>पूर्ण राज्य के प्रस्ताव पर J&amp;K विधानसभा में बवाल, BJP विधायक को मार्शलों ने निकाला; उमर बोले- सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और BJP आमने-सामने आ गए। भाजपा ने प्रस्ताव में वर्ष 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव का जिक्र किए जाने का विरोध किया। हंगामा बढ़ने पर BJP विधायक विक्रम रंधावा को सदन से बाहर निकाला गया और कार्यवाही सोमवार तक स्थगित कर दी गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/ruckus-in-jk-assembly-over-the-proposal-of-full-statehood/article-2197"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/jk-assembly-statehood-omar-abdullah-bjp-vikram-randhawa-2026.jpg2.jpg" alt=""></a><br /><h2><span><strong>स्टेटहुड प्रस्ताव पर भिड़े सत्ता पक्ष और BJP, 2000 के जिक्र से बढ़ा विवाद </strong></span></h2>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/jk-assembly-statehood-omar-abdullah-bjp-vikram-randhawa-2026.jpg2.jpg" alt="jk-assembly-statehood-omar-abdullah-bjp-vikram-randhawa-2026.jpg2" width="1366" height="768"></img>
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य बहाली के प्रस्ताव पर हुए हंगामे के बीच BJP विधायक विक्रम रंधावा को मार्शलों ने सदन से बाहर निकाला।

<p><span><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 25 सितंबर 2026</strong></span></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य दर्जा तत्काल बहाल करने का प्रस्ताव पेश किया</strong></li>
<li><strong>प्रस्ताव में 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 के पुराने प्रस्तावों का जिक्र</strong></li>
<li><strong>2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव के संदर्भ पर BJP ने जताई आपत्ति</strong></li>
<li><strong>BJP विधायकों ने प्रस्ताव की प्रतियां फाड़ीं और सदन के वेल में पहुंचे</strong></li>
<li><strong>हंगामे के बीच BJP विधायक विक्रम रंधावा को बाहर निकाला गया</strong></li>
<li><strong>सदन की कार्यवाही सोमवार तक स्थगित</strong></li>
</ul>
<h6><strong>श्रीनगर।</strong> जम्मू-कश्मीर विधानसभा में शुक्रवार को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के मुद्दे पर जोरदार हंगामा हुआ। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन में एक प्रस्ताव पेश कर केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग की। प्रस्ताव सामने आते ही BJP विधायकों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।</h6>
<h6>विवाद राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग से ज्यादा प्रस्ताव में शामिल एक पुराने संदर्भ को लेकर बढ़ा। प्रस्ताव में 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पारित प्रस्तावों का उल्लेख किया गया था। BJP ने खास तौर पर वर्ष 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव के जिक्र पर आपत्ति जताई।</h6>
<h2><span><strong>BJP ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?</strong></span></h2>
<h6>वर्ष 2000 में तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार के दौरान जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने अधिक स्वायत्तता की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था। शुक्रवार को उमर अब्दुल्ला द्वारा पेश नए प्रस्ताव में उसी पुराने प्रस्ताव का उल्लेख किए जाने पर BJP विधायकों ने विरोध किया।</h6>
<h6>BJP विधायकों का कहना था कि वे सदन में स्वायत्तता के मुद्दे पर चर्चा नहीं होने देंगे। इसके बाद पार्टी के विधायक अपनी सीटों से उठकर नारेबाजी करने लगे और कुछ सदस्यों ने प्रस्ताव की प्रतियां भी फाड़ दीं।</h6>
<h6>यह भी महत्वपूर्ण है कि BJP का तत्काल विरोध प्रस्ताव में <strong>2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव के संदर्भ</strong> को लेकर था; इसे केवल पूर्ण राज्य की मांग के विरोध के रूप में पेश करना पूरी तस्वीर नहीं होगी।</h6>
<h2><span><strong>हंगामे के बीच विक्रम रंधावा को सदन से बाहर निकाला</strong></span></h2>
<h6>विरोध बढ़ने के बाद BJP विधायक सदन के वेल में पहुंचे और नारेबाजी जारी रही। सत्ता पक्ष की ओर से भी जवाबी नारे लगाए गए, जिससे सदन का माहौल और गरमा गया।</h6>
<h6>हंगामे के दौरान BJP विधायक विक्रम रंधावा को मार्शलों ने सदन से बाहर निकाला। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक रंधावा आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद उन्हें बाहर ले जाया गया। लगातार हंगामे के कारण विधानसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी।</h6>
<h2><span><strong>उमर अब्दुल्ला ने BJP को क्या जवाब दिया?</strong></span></h2>
<h6>विरोध के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उनकी मांग उनकी पार्टी या सरकार के लिए नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की है। उन्होंने BJP नेताओं की ओर से लगाए गए राष्ट्र-विरोधी होने के आरोपों का भी जवाब दिया।</h6>
<h6>उमर अब्दुल्ला ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने देश के लिए कई बलिदान दिए हैं और उन्हें BJP से किसी तरह के “सर्टिफिकेट” की जरूरत नहीं है। यह प्रतिक्रिया BJP सदस्यों की ओर से नेशनल कॉन्फ्रेंस पर लगाए गए आरोपों के जवाब में आई।</h6>
<h2><span><strong>प्रस्ताव में आखिर लिखा क्या है?</strong></span></h2>
<h6>मुख्यमंत्री की ओर से पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को सदन द्वारा पारित प्रस्तावों के अतिरिक्त विधानसभा भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग करती है और इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय करती है।</h6>
<h6>उमर अब्दुल्ला ने सदन में कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों से परिसीमन, चुनाव और उसके बाद राज्य का दर्जा बहाल करने की तीन चरणों वाली प्रक्रिया का वादा किया गया था। उन्होंने कहा कि परिसीमन और विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, इसलिए अब राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए। यह मुख्यमंत्री का पक्ष है।</h6>
<h2><span><strong>कांग्रेस, PDP और AAP का क्या रुख रहा?</strong></span></h2>
<h6>द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ कांग्रेस सदस्यों ने भी प्रस्ताव का स्वागत किया। PDP के सदस्यों और सदन में AAP के एकमात्र विधायक ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया।</h6>
<h6>दूसरी तरफ BJP ने स्पष्ट किया कि उसकी आपत्ति प्रस्ताव में 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव को शामिल किए जाने पर है। इसी मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच तीखी नारेबाजी हुई।</h6>
<h2><span><strong>2000 और 2024 के प्रस्ताव क्यों बने विवाद का कारण?</strong></span></h2>
<h6>26 जून 2000 को फारूक अब्दुल्ला सरकार के समय जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने अधिक स्वायत्तता से जुड़ा प्रस्ताव पारित किया था। शुक्रवार के प्रस्ताव में इसका उल्लेख होने के कारण BJP ने इसे स्वीकार करने से इनकार किया।</h6>
<h6>वहीं 6 नवंबर 2024 के प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली से जुड़ी मांग की गई थी। शुक्रवार के नए प्रस्ताव में दोनों पुराने प्रस्तावों का संदर्भ शामिल किया गया।</h6>
<h2><span><strong>अब आगे क्या होगा?</strong></span></h2>
<h6>शुक्रवार को भारी हंगामे के कारण प्रस्ताव पर प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्ताव को सोमवार को मतदान के लिए रखे जाने की संभावना है। वहीं विधानसभा की कार्यवाही भी सोमवार तक स्थगित कर दी गई है।</h6>
<h6>ऐसे में अब नजर सोमवार की कार्यवाही पर रहेगी—क्या प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान हो पाएगा, और 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव के संदर्भ को लेकर सत्ता पक्ष और BJP के बीच गतिरोध किस दिशा में जाता है।</h6>
<h6><strong>जम्मू-कश्मीर विधानसभा का विवाद केवल पूर्ण राज्य की मांग तक सीमित नहीं रहा। असली टकराव नए प्रस्ताव में वर्ष 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव का संदर्भ जोड़ने पर हुआ। उमर अब्दुल्ला इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकार से जोड़ रहे हैं, जबकि BJP उस पुराने स्वायत्तता प्रस्ताव के संदर्भ का विरोध कर रही है। अब सोमवार की कार्यवाही तय करेगी कि यह प्रस्ताव आगे किस रूप में बढ़ता है।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 18:47:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>CEC के खिलाफ प्रदर्शन से पहले AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को हिरासत में लेने का दावा, दिल्ली पुलिस पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का दावा सामने आया है। नेहा बोरा ने शुक्रवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। हालांकि उनकी हिरासत और उसके कारण को लेकर दिल्ली पुलिस की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/neha-bora-detained-claim-delhi-police-gyanesh-kumar-jantar-mantar-protest/article-2196"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/neha-bora-delhi-police-jantar-mantar-protest-2026.jpg.jpg" alt=""></a><br /><h2><span><strong>जंतर-मंतर पर होना था प्रदर्शन, उससे पहले नेहा बोरा को ले जाने का दावा</strong></span></h2>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/neha-bora-delhi-police-jantar-mantar-protest-2026.jpg.jpg" alt="neha-bora-delhi-police-jantar-mantar-protest-2026.jpg" width="1366" height="768"></img>
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का दावा सामने आया है।

<p><span><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 25 सितंबर 2026</strong></span></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस द्वारा ले जाए जाने का सोशल मीडिया पर दावा</strong></li>
<li><strong>CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का किया था ऐलान</strong></li>
<li><strong>CJP भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दे चुकी है</strong></li>
<li><strong>संगठन ने चेतावनी दी थी कि इस्तीफा नहीं हुआ तो ‘Jantar Mantar 2.0’ आंदोलन होगा</strong></li>
<li><strong>हिरासत की वजह और कानूनी आधार पर दिल्ली पुलिस का आधिकारिक बयान फिलहाल उपलब्ध नहीं</strong></li>
</ul>
<h6>नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बढ़ते विरोध के बीच AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का दावा सामने आया है। सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे पोस्ट में कहा गया है कि पुलिस ने उन्हें उनके घर से अपने साथ लिया।</h6>
<h6>यह दावा ऐसे समय सामने आया है जब नेहा बोरा ने शुक्रवार को जंतर-मंतर पर CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया था। <em>द टेलीग्राफ</em> ने भी 25 सितंबर को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में बताया कि AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने शुक्रवार के लिए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा की थी।</h6>
<h6>हालांकि खबर लिखे जाने तक दिल्ली पुलिस की ओर से इस कथित हिरासत के कारण, स्थान या कानूनी आधार को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं था। इसलिए इसे फिलहाल सोशल मीडिया पर सामने आए दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।</h6>
<h2><span><strong>नेहा बोरा ने क्यों किया था प्रदर्शन का ऐलान?</strong></span></h2>
<h6>चुनाव आयोग और SIR को लेकर जारी विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज हुई है।</h6>
<h6>इसी क्रम में नेहा बोरा ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। इससे पहले Cockroach Janta Party यानी CJP ने भी ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे में इस्तीफा देने की मांग करते हुए देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी थी। CJP ने कहा था कि मांग पूरी नहीं होने पर ‘Jantar Mantar 2.0’ आयोजित किया जाएगा।</h6>
<h2><span><strong>हिरासत को लेकर सोशल मीडिया पर क्या दावा किया गया?</strong></span></h2>
<h6>सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस उनके घर से लेकर गई।</h6>
<h6>पोस्ट में इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे प्रस्तावित आंदोलन से भी जोड़ा गया है। हालांकि ऐसा कोई स्वतंत्र प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि अगर नेहा बोरा को हिरासत में लिया गया, तो उसकी वजह ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन ही था।</h6>
<h6>यही वजह है कि पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।</h6>
<h2><span><strong>क्या इसे ‘अवैध हिरासत’ कहा जा सकता है?</strong></span></h2>
<h6>सोशल मीडिया पोस्ट में कार्रवाई को लेकर ‘अवैध हिरासत’ का सवाल उठाया गया है, लेकिन केवल पोस्ट के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।</h6>
<h6>यह जानना जरूरी है कि पुलिस ने नेहा बोरा को किस कानूनी प्रावधान के तहत रोका या हिरासत में लिया, क्या उन्हें कोई नोटिस दिया गया था और उन्हें कहां ले जाया गया।</h6>
<h6>इन तथ्यों के सामने आने के बाद ही हिरासत की वैधता पर कोई कानूनी निष्कर्ष निकाला जा सकता है।</h6>
<h2><span><strong>कौन हैं नेहा बोरा?</strong></span></h2>
<h6>नेहा बोरा All India Students’ Association यानी AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की शोधार्थी हैं। हाल के महीनों में वह छात्र आंदोलनों का एक प्रमुख चेहरा बनकर सामने आई हैं।</h6>
<h6>जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान उन्होंने करीब 23 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। बाद में भी वह परीक्षा, भर्ती और छात्र आंदोलनों से जुड़े कई प्रदर्शनों में सक्रिय रही हैं।</h6>
<h2><span><strong>CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्यों बढ़ा विरोध?</strong></span></h2>
<h6>विवाद उस रिपोर्ट के बाद और तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बीते करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं।</h6>
<h6>CJP ने इसी विवाद के बीच ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र जांच और कुछ अन्य मांगों को लेकर अभियान शुरू किया है। संगठन ने 48 घंटे में इस्तीफा नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।</h6>
<h6>चुनाव आयोग का पक्ष है कि किसी बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।</h6>
<h2><span><strong>अब दिल्ली पुलिस के जवाब का इंतजार</strong></span></h2>
<h6>फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि नेहा बोरा को वास्तव में हिरासत में लिया गया है या नहीं और अगर लिया गया है तो किस आधार पर।</h6>
<h6>जब तक दिल्ली पुलिस या AISA की ओर से हिरासत के समय, कारण और मौजूदा स्थिति की विस्तृत जानकारी नहीं आती, तब तक सोशल मीडिया पर किए जा रहे बड़े दावों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।</h6>
<h6><strong>CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से ठीक पहले नेहा बोरा को हिरासत में लिए जाने का दावा इस मामले को और संवेदनशील बनाता है। लेकिन सबसे जरूरी तथ्य अभी सामने आना बाकी है—दिल्ली पुलिस ने उन्हें किस आधार पर और किन परिस्थितियों में अपने साथ लिया। पुलिस की आधिकारिक जानकारी आने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 18:31:08 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>19 साल बिलासपुर में रहा बांग्लादेशी अतीक, पासपोर्ट से वोटर ID तक मिले कई भारतीय दस्तावेज; STF ने पकड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में STF और पुलिस ने 42 वर्षीय अतीक हुसैन को पकड़ा है। पुलिस के अनुसार वह बांग्लादेश का नागरिक है और करीब 19 साल से बिलासपुर में रह रहा था। उसके पास से भारतीय पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर ID, ड्राइविंग लाइसेंस समेत कई दस्तावेज मिलने का दावा किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/bangladeshi-atiq-lived-in-bilaspur-for-19-years-many-indian/article-2192"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/bangladeshi-atique-hussain-bilaspur-stf-arrest-2026.jpg.jpg" alt=""></a><br /><h2><span><strong>19 साल तक पहचान पर नहीं उठा सवाल, अब दस्तावेजों की पूरी चेन जांच के घेरे में</strong></span></h2>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/bangladeshi-atique-hussain-bilaspur-stf-arrest-2026.jpg.jpg" alt="bangladeshi-atique-hussain-bilaspur-stf-arrest-2026.jpg" width="1366" height="768"></img>
बिलासपुर में STF की कार्रवाई में पकड़ा गया अतीक हुसैन, पुलिस के मुताबिक उसके पास कई भारतीय पहचान दस्तावेज मिले हैं।

<p><span><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 25 सितंबर 2026</strong></span></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>पुलिस के मुताबिक अतीक हुसैन बांग्लादेश के नारायणगंज का रहने वाला है</strong></li>
<li><strong>वर्ष 2005 में भारत आने और 2007 से बिलासपुर में रहने की जानकारी</strong></li>
<li><strong>NTPC सीपत में निजी कंपनी के जरिए करता था लिफ्ट मेंटेनेंस</strong></li>
<li><strong>पासपोर्ट, आधार, पैन, वोटर ID और ड्राइविंग लाइसेंस समेत कई दस्तावेज मिले</strong></li>
<li><strong>दस्तावेज बनवाने में किसने मदद की, इसकी जांच कर रही पुलिस</strong></li>
<li><strong>रायपुर के होल्डिंग सेंटर भेजा गया, डिपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू</strong></li>
</ul>
<h6><strong>बिलासपुर।</strong> छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पहचान दस्तावेजों की जांच और उन्हें जारी करने की प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। STF और जिला पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में 42 वर्षीय अतीक हुसैन को पकड़ा गया है। पुलिस का कहना है कि अतीक मूल रूप से बांग्लादेश का नागरिक है और वह कई वर्षों से भारत में रह रहा था।</h6>
<h6>पुलिस के मुताबिक अतीक वर्ष 2005 में बांग्लादेश से भारत आया था। इसके बाद करीब दो साल तमिलनाडु में रहने के बाद वह 2007 में बिलासपुर पहुंचा। यहां वह लंबे समय से रह रहा था।</h6>
<h2><span><strong>NTPC सीपत तक कैसे पहुंचा अतीक?</strong></span></h2>
<h6>जांच में सामने आया कि अतीक बिलासपुर के सीपत स्थित NTPC प्लांट में लिफ्ट मेंटेनेंस का काम करता था। वह सीधे NTPC का कर्मचारी नहीं था, बल्कि BECO Lifts Private Limited नाम की निजी एजेंसी के जरिए काम कर रहा था।</h6>
<h6>बिलासपुर के SSP रजनेश सिंह ने <em>The New Indian Express</em> को बताया कि लिफ्ट मेंटेनेंस के काम के कारण उसे प्लांट की प्रशासनिक और परिचालन इमारतों में आने-जाने का अवसर मिलता था। इसके बाद सुरक्षा जांच और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे हैं।</h6>
<h2><span><strong>पासपोर्ट से वोटर ID तक, क्या-क्या मिला?</strong></span></h2>
<h6>पुलिस ने अतीक के किराये के मकान की तलाशी के दौरान कई भारतीय दस्तावेज बरामद करने का दावा किया है।</h6>
<h6>इनमें भारतीय पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर ID, ड्राइविंग लाइसेंस, निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और नौवीं कक्षा की मार्कशीट शामिल हैं।</h6>
<h6>पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान अतीक ने इन दस्तावेजों को गलत तरीके से बनवाने की बात स्वीकार की है। हालांकि अब जांच इस बात की भी हो रही है कि अलग-अलग सरकारी दस्तावेज उसे किस प्रक्रिया के जरिए मिले और इसमें किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं।</h6>
<h2><span><strong>भारतीय पासपोर्ट कैसे बना, अब यही बड़ा सवाल</strong></span></h2>
<h6>रिपोर्टों के मुताबिक अतीक के पास भारतीय पासपोर्ट भी मिला है। स्थानीय रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से कहा गया है कि पासपोर्ट वर्ष 2018 में बनवाया गया था। इसके बाद दूसरे पहचान दस्तावेज भी बनाए जाने की जानकारी सामने आई है।</h6>
<h6>अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन दस्तावेजों के आवेदन में किन कागजों का इस्तेमाल हुआ, सत्यापन किस स्तर पर हुआ और क्या किसी व्यक्ति ने जानबूझकर उसकी मदद की।</h6>
<h2><span><strong>वोटर ID मिलने से भी उठे सवाल</strong></span></h2>
<h6>अतीक के पास वोटर ID मिलने की पुष्टि कई रिपोर्टों में पुलिस के हवाले से की गई है। इससे यह सवाल भी उठा है कि विदेशी नागरिक के नाम पर मतदाता पहचान पत्र बनने तक मामला कैसे पहुंचा।</h6>
<h6>हालांकि किसी व्यक्ति के पास वोटर ID मिलने और उसके वास्तव में चुनाव में मतदान करने के बीच अंतर है। एक स्थानीय रिपोर्ट में मतदान करने का दावा भी किया गया है, लेकिन इस बिंदु की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए फिलहाल इतना ही स्थापित है कि उसके पास वोटर ID मिलने की बात पुलिस ने कही है।</h6>
<h2><span><strong>सोशल मीडिया पर SIR को लेकर भी छिड़ी बहस</strong></span></h2>
<h6>मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे मतदाता सूची की जांच और SIR से भी जोड़ा जा रहा है। पत्रकार शुभम शुक्ला ने X पर सवाल उठाया कि इतने भारतीय दस्तावेज और वोटर ID आखिर कैसे बन गए और ऐसे मामलों में मतदाता सूची की गहन जांच होनी चाहिए।</h6>
<h6>यह उनका विचार और राजनीतिक-प्रशासनिक मांग है। फिलहाल पुलिस की जांच अतीक की नागरिकता, उसके दस्तावेजों और उन्हें बनवाने की प्रक्रिया पर केंद्रित है। उपलब्ध पुलिस रिपोर्ट में इस गिरफ्तारी को किसी SIR कार्रवाई का नतीजा नहीं बताया गया है।</h6>
<h2><span><strong>अब पुलिस किन लोगों की तलाश कर रही है?</strong></span></h2>
<h6>पुलिस अब उन लोगों की भूमिका की जांच कर रही है जिन्होंने कथित तौर पर अतीक को दस्तावेज तैयार कराने में मदद की हो सकती है। साथ ही यह पता लगाया जा रहा है कि इतने वर्षों तक उसकी पहचान और दस्तावेज सत्यापन में गड़बड़ी कहां हुई।</h6>
<h6>अतीक को रायपुर के होल्डिंग सेंटर भेजा गया है। पुलिस के मुताबिक उसके बांग्लादेश डिपोर्टेशन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है और संबंधित अधिकारियों तथा बांग्लादेशी मिशन को सूचना भेजी जा रही है।</h6>
<h2><span><strong>19 साल बाद खुली पहचान, जांच अब दस्तावेजों से आगे</strong></span></h2>
<h6>यह मामला केवल एक विदेशी नागरिक के पकड़े जाने तक सीमित नहीं है। जांच का अहम हिस्सा अब यह भी है कि अलग-अलग स्तरों पर भारतीय पहचान से जुड़े इतने दस्तावेज आखिर जारी कैसे हुए और सत्यापन प्रक्रिया में कहां चूक हुई।</h6>
<h6>इन सवालों के जवाब पुलिस जांच पूरी होने और संबंधित विभागों के रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।</h6>
<h6><strong>अतीक हुसैन की गिरफ्तारी के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वह इतने साल भारत में कैसे रहा, बल्कि यह भी है कि पासपोर्ट से लेकर वोटर ID तक अलग-अलग भारतीय दस्तावेज उसके नाम पर कैसे बने। अब पुलिस की जांच यह तय करेगी कि यह केवल फर्जी कागजों का मामला था या इसके पीछे मदद करने वालों की कोई बड़ी चेन भी मौजूद थी।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/bangladeshi-atiq-lived-in-bilaspur-for-19-years-many-indian/article-2192</link>
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                <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 15:31:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>14 आपत्तियां, फिर भी सर्वसम्मति से फैसले कैसे? चुनाव आयोग की सफाई के बाद उठे नए सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों की कम से कम 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद आयोग ने कहा कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। अब बहस इस बात पर है कि जिन मुद्दों पर शुरुआत में गंभीर सवाल उठे, उन पर आखिर सहमति कैसे बनी और क्या आयोग इससे जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/gyanesh-kumar-election-commission-14-objections-unanimous-decisions/article-2191"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/gyanesh-kumar-election-commission-14-objections-unanimous-decisions.jpg" alt=""></a><br /><h2><span><strong>आपत्तियां दर्ज हुईं, फिर सहमति कैसे बनी? अब इसी जवाब पर टिकी नजर</strong></span></h2>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/gyanesh-kumar-election-commission-14-objections-unanimous-decisions.jpg" alt="gyanesh-kumar-election-commission-14-objections-unanimous-decisions" width="1366" height="768"></img>
दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के सर्वसम्मति से फैसले वाले दावे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

<h6><span><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 25 सितंबर 2026</strong></span></h6>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की—रिपोर्ट</strong></li>
<li><strong>चुनाव आयोग का दावा—अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए</strong></li>
<li><strong>Form-6, ECINet और मतदाता सूची से जुड़े मामलों पर उठे थे सवाल</strong></li>
<li><strong>आयोग ने मतभेद को सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा बताया</strong></li>
<li><strong>अब सवाल—आपत्तियों से अंतिम सहमति तक की पूरी प्रक्रिया क्या थी?</strong></li>
</ul>
<h6><strong>नई दिल्ली।</strong> चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज को लेकर सामने आई रिपोर्ट और उसके बाद आयोग की सफाई ने एक नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के विभिन्न कदमों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा कि अलग-अलग राय आंतरिक विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है और पिछले एक साल के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।</h6>
<h6>लेकिन आयोग की इसी सफाई के बाद अब एक बड़ा सवाल सामने आया है—अगर कई मामलों पर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी, तो अंतिम फैसला लेते समय वे उसी फैसले से सहमत कैसे हुए?</h6>
<h2><span><strong>किन मुद्दों पर आयुक्तों ने उठाए थे सवाल?</strong></span></h2>
<h6><em>इंडियन एक्सप्रेस</em> की जांच रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों पर थीं। इनमें नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में बदलाव, ECINet की व्यवस्था, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा कुछ प्रशासनिक फैसले शामिल थे।</h6>
<h6>रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ मामलों में आयुक्तों ने कड़ी भाषा में अपनी आपत्ति दर्ज कराई। Form-6 में बदलाव को लेकर भी दोनों आयुक्तों की ओर से सवाल उठाए जाने की बात सामने आई।</h6>
<h2><span><strong>चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?</strong></span></h2>
<h6>चुनाव आयोग ने इस विवाद पर कहा कि किसी बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार, सुझाव और टिप्पणियां होना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग के मुताबिक बीते 10 महीनों में 40 से ज्यादा पहल और कई चुनाव सुधार किए गए, जबकि पिछले एक साल के अंतिम फैसले सभी चुनाव आयुक्तों की भागीदारी और सहमति से लिए गए।</h6>
<h6>आयोग का पक्ष यह है कि ड्राफ्ट स्तर पर दी गई टिप्पणियों या आपत्तियों को अंतिम फैसले से अलग करके देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।</h6>
<h2><span><strong>सफाई के बाद नया सवाल क्यों उठा?</strong></span></h2>
<h6>यहीं से विवाद का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। अगर शुरुआत में किसी प्रस्ताव या प्रक्रिया पर लिखित आपत्ति थी, लेकिन अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुआ, तो बीच में ऐसा क्या बदला कि सभी सदस्य सहमत हो गए?</h6>
<h6>AajTak के विश्लेषण में भी इसी सवाल को प्रमुखता से उठाया गया है। लेख में कहा गया है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि आपत्तियों के बाद क्या विस्तृत चर्चा हुई, क्या संबंधित प्रस्तावों में बदलाव किए गए या किसी कानूनी और तकनीकी स्पष्टीकरण के बाद आयुक्तों की चिंताएं दूर हुईं। हालांकि लेख में रखी गई ये संभावनाएं हैं, स्थापित तथ्य नहीं।</h6>
<h2><span><strong>क्या आपत्तियां चर्चा के बाद दूर हो गई थीं?</strong></span></h2>
<h6>एक संभावना यह हो सकती है कि शुरुआती मसौदे पर सवाल उठने के बाद आयोग के भीतर चर्चा हुई हो और बाद में संबंधित बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मिलने से सहमति बन गई हो।</h6>
<h6>दूसरी संभावना यह भी हो सकती है कि कुछ आपत्तियां केवल प्रक्रिया से जुड़ी रही हों और अंतिम फैसले तक पहुंचने से पहले उनमें बदलाव किया गया हो।</h6>
<h6>लेकिन फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से यह साफ नहीं है कि प्रत्येक आपत्ति पर अलग-अलग क्या समाधान निकला। इसलिए इस पर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। AajTak के विश्लेषण ने भी इन कारणों को संभावनाओं के रूप में ही रखा है।</h6>
<h2><span><strong>क्या फैसलों की कॉपी सामने आएगी?</strong></span></h2>
<h6>ऐसा होने पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि आयुक्तों ने किस बिंदु पर आपत्ति जताई थी और अंतिम फैसले में क्या बदलाव या स्पष्टीकरण आया। हालांकि चुनाव आयोग ने ऐसी प्रतियां जारी करने की कोई घोषणा की है, इसका सार्वजनिक प्रमाण फिलहाल सामने नहीं है।</h6>
<h2><span><strong>Form-6 को लेकर क्या था विवाद?</strong></span></h2>
<h6>नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित अतिरिक्त सवाल जोड़े जाने को लेकर भी विवाद सामने आया था। <em>इंडियन एक्सप्रेस</em> की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी और इसके कानूनी आधार को लेकर सवाल किए थे।</h6>
<h6>यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि Form-6 नए मतदाता के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।</h6>
<h2><span><strong>अब असली सवाल पारदर्शिता का</strong></span></h2>
<h6>इस पूरे मामले में फिलहाल दो बातें साथ-साथ सामने हैं। पहली, दो चुनाव आयुक्तों द्वारा कई मुद्दों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट। दूसरी, चुनाव आयोग का यह कहना कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।</h6>
<h6>इन दोनों बातों में अपने-आप विरोधाभास होना जरूरी नहीं है, क्योंकि विचार-विमर्श के दौरान मतभेद के बाद सहमति बन सकती है। लेकिन सार्वजनिक बहस का केंद्र अब यह है कि इस खास मामले में सहमति बनने की प्रक्रिया क्या थी।</h6>
<h6><strong>चुनाव आयोग के भीतर मतभेद होना अपने-आप में असामान्य नहीं है, लेकिन 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद सवाल केवल मतभेद का नहीं बल्कि उसके समाधान का है। आयोग ने अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति वाला बताया है। अब यदि आपत्तियों से सहमति तक पहुंचने की प्रक्रिया और स्पष्ट होती है, तो इस विवाद से जुड़े कई सवालों के जवाब भी सामने आ सकते हैं।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/gyanesh-kumar-election-commission-14-objections-unanimous-decisions/article-2191</link>
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                <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 15:10:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>SIR के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाएं, ज्ञानेश कुमार के 14 आदेश रद्द करने और हटाए गए वोटरों के नाम लौटाने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[महाराष्ट्र में SIR के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट और उसकी कोल्हापुर सर्किट बेंच में दो याचिकाएं दाखिल हुई हैं। इनमें CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों को रद्द करने और हटाए गए मतदाताओं के नाम सूची में बहाल करने की मांग की गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/bombay-high-court--maharashtra-sir--gyanesh-kumar--election-commission--deleted-voters--electoral-rolls--voter-list/article-2185"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/bombay-high-court-maharashtra-sir-voter-deletion-petitions.jpg.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/bombay-high-court-maharashtra-sir-voter-deletion-petitions.jpg.jpg" alt="bombay-high-court-maharashtra-sir-voter-deletion-petitions.jpg" width="1366" height="768"></img>
महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल कर हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की गई है।

<h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>चुनाव आयोग पर जारी विवाद अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र में SIR रोकने, हटाए गए मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने और CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 आदेशों को रद्द करने की मांग वाली दो याचिकाएं बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हुई हैं।</strong></h1>
<p> </p>
<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 25 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>SIR के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में दो याचिकाएं</strong></li>
<li><strong>CEC से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों को चुनौती</strong></li>
<li><strong>हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग</strong></li>
<li><strong>बिना सुनवाई नाम काटने का लगाया गया आरोप</strong></li>
<li><strong>महाराष्ट्र में SIR रोकने की भी मांग</strong></li>
</ul>
<h6>मुंबई। महाराष्ट्र में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR का विवाद अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। SIR की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट और उसकी कोल्हापुर सर्किट बेंच में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गई हैं।</h6>
<h6>याचिकाओं में मतदाता सूची से मनमाने तरीके से नाम हटाने, प्रभावित मतदाताओं को सुनवाई का उचित अवसर नहीं देने और चुनाव आयोग की प्रक्रिया में गड़बड़ी होने के आरोप लगाए गए हैं।</h6>
<h2>Challenge To 14 Administrative Orders</h2>
<h6>कोल्हापुर सर्किट बेंच में महाराष्ट्र के तीन निवासियों की ओर से वकील असीम सरोदे ने एक याचिका दाखिल की है। इसमें पिछले लगभग 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों एवं कार्रवाइयों को रद्द करने की मांग की गई है।</h6>
<h6>याचिकाकर्ताओं ने उस रिपोर्ट का भी उल्लेख किया है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने तथा Electoral Roll Database से जुड़े फैसलों पर सवाल या आपत्तियां उठाई थीं।</h6>
<h6>हालांकि चुनाव आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि उसके अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए और किसी आयुक्त ने औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई।</h6>
<h2>Demand To Stop SIR In Maharashtra</h2>
<h6>याचिका में अदालत से महाराष्ट्र में चल रही SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग से संबंधित 2023 के कानून के Section 18 के तहत अपनी जिम्मेदारी का सही तरीके से पालन नहीं किया।</h6>
<h6>यह याचिकाकर्ताओं का कानूनी दावा है, जिस पर चुनाव आयोग का जवाब और अदालत का फैसला आना बाकी है।</h6>
<h2>Deleted Names Should Be Restored</h2>
<h6>याचिका में मांग की गई है कि महाराष्ट्र में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए सभी लोगों के नाम दोबारा शामिल किए जाएं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी योग्य नागरिक को उचित जांच और सुनवाई के बिना मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।</h6>
<h6>दूसरी याचिका में Booth Level Officers और संबंधित अधिकारियों पर मनमाने तरीके से काम करने का आरोप लगाया गया है। दावा है कि कई मतदाताओं के नाम सूची से हटाने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर नहीं मिला।</h6>
<h2>What Is The Election Commission’s Stand?</h2>
<h6>चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित, दोहरे पंजीकरण और अपात्र नाम हटाकर सूची को सही बनाना है। आयोग के अनुसार, योग्य मतदाताओं को नाम जोड़ने और नाम हटाए जाने के खिलाफ आपत्ति एवं अपील करने की सुविधा उपलब्ध है।</h6>
<h6>आयोग विपक्ष के उन आरोपों को भी खारिज करता रहा है, जिनमें SIR के जरिए किसी खास राजनीतिक दल या मतदाता वर्ग को निशाना बनाने का दावा किया गया है।</h6>
<h2>High Court Has Not Passed Any Order Yet</h2>
<h6>दोनों याचिकाएं अदालत में दाखिल हो गई हैं, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभी महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने या हटाए गए सभी मतदाताओं के नाम बहाल करने का कोई आदेश नहीं दिया है।</h6>
<h6>मामले पर 28 सितंबर के आसपास सुनवाई होने की संभावना जताई जा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत चुनाव आयोग से जवाब मांग सकती है और याचिकाओं में लगाए गए आरोपों एवं उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच करेगी।</h6>
<h1><strong>बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल दोनों याचिकाओं ने महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया को बड़ी कानूनी चुनौती दे दी है। अब अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि मतदाता सूची की सफाई और योग्य नागरिकों के मतदान अधिकार के बीच संतुलन बना या बिना पर्याप्त सुनवाई बड़ी संख्या में नाम हटा दिए गए।</strong></h1>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/bombay-high-court--maharashtra-sir--gyanesh-kumar--election-commission--deleted-voters--electoral-rolls--voter-list/article-2185</link>
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                <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 11:52:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘SIR का कोई मतलब नहीं, चुनाव आयोग की छवि हो रही खराब’, पूर्व आयुक्त अशोक लवासा के बयान से मचा सियासी घमासान</title>
                                    <description><![CDATA[पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने SIR को उद्देश्यहीन बताते हुए इसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्था की छवि खराब होते देख उन्हें दुख हुआ है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/sir-has-no-meaning-the-image-of-the-election-commission/article-2181"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/yagyhhahbalt,y-p-rr-;-ltttpot-k-t-kkkkgggsglkevg-ee-lalrto-kboak]kkjjgmkff-kifr-fr-frr-(4).jpg" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>SIR को लेकर चुनाव आयोग पहले ही विपक्ष के सवालों से घिरा है। अब पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने इसकी प्रक्रिया को उद्देश्यहीन बताते हुए पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके बयान के बाद चुनाव आयोग को लेकर जारी विवाद और तेज हो सकता है।</strong></h1>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/yagyhhahbalt,y-p-rr-;-ltttpot-k-t-kkkkgggsglkevg-ee-lalrto-kboak%5Dkkjjgmkff-kifr-fr-frr-(4).jpg" alt="yagyhhahbalt,y p rr ; ltttpot k t kkkkgggsglkevg ee lalrto kboak]kkjjgmkff kifr fr frr (4)" width="1366" height="768"></img>
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने SIR की प्रक्रिया को उद्देश्यहीन बताते हुए चुनाव आयोग की छवि और पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 24 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>अशोक लवासा ने SIR प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल</strong></li>
<li><strong>कहा—चुनाव आयोग की छवि खराब होने का दुख</strong></li>
<li><strong>SIR की मौजूदा प्रक्रिया को बताया उद्देश्यहीन</strong></li>
<li><strong>Form-6 में माता-पिता से जुड़े सवाल पर भी आपत्ति</strong></li>
<li><strong>तकनीक और कानून को लेकर चुनाव आयोग को दी नसीहत</strong></li>
</ul>
<h6>नई दिल्ली। मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने SIR की मौजूदा प्रक्रिया और चुनाव आयोग के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं।</h6>
<h6>एक समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में अशोक लवासा ने कहा कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि चुनाव आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्था की छवि खराब हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि SIR के कारण मतदाताओं को हो रही परेशानी को लेकर चुनाव आयुक्त भी चिंतित दिखाई दिए।</h6>
<h2>Questions Raised On SIR Process</h2>
<h6>अशोक लवासा ने कहा कि जिस तरीके से SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, उसमें सभी चीजें उचित तरीके से होती हुई दिखाई नहीं दे रही हैं। उन्होंने दावा किया कि इस बार SIR के लिए अपनाई गई प्रक्रिया का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया।</h6>
<h6>लवासा ने कहा कि चुनाव आयोग जब भी कोई नई व्यवस्था लागू करता है तो उसकी पूरी Guidelines जारी करता है। लोगों को स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि प्रक्रिया कैसे पूरी होगी और उसे लागू करने का उद्देश्य क्या है।</h6>
<h6>उनका कहना है कि इस बार Logical Discrepancy और Voter Mapping जैसे शब्दों के स्पष्ट मायने और मापदंड मतदाताओं के सामने नहीं रखे गए।</h6>
<h2>Technology Cannot Replace Law</h2>
<h6>अशोक लवासा ने तकनीक और कानून के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि तकनीक का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया को सहयोग देने के लिए किया जाना चाहिए। तकनीक ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों में बाधा पैदा हो।</h6>
<h6>उन्होंने सवाल किया कि यदि कोई नागरिक पिछले 20 या 25 वर्षों से मतदाता सूची में शामिल है और तकनीकी व्यवस्था उसे किसी पुराने रिकॉर्ड से जोड़ नहीं पा रही, तो इसका असर उसके मतदान के अधिकार पर क्यों पड़ना चाहिए?</h6>
<h2>Question Over Form-6</h2>
<h6>मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले Form-6 में माता-पिता से जुड़ा सवाल शामिल करने पर भी अशोक लवासा ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह सवाल चुनाव आयोग से पूछा जाना चाहिए कि इसे फॉर्म में शामिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।</h6>
<h6>लवासा के अनुसार, SIR के माध्यम से जो लक्ष्य हासिल करने का दावा किया जा रहा है, उसे किसी आसान और कम परेशानी वाली प्रक्रिया से भी पूरा किया जा सकता था। इसी आधार पर उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को उद्देश्यहीन बताया।</h6>
<h2>Election Commission Already Facing Questions</h2>
<h6>SIR को लेकर पिछले कुछ दिनों से चुनाव आयोग के भीतर मतभेद होने के दावे भी सामने आए हैं। हालांकि आयोग ने साफ किया है कि बैठकों में अधिकारियों ने सवाल और सुझाव जरूर दिए थे, लेकिन किसी आयुक्त ने अंतिम निर्णय के खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई।</h6>
<h6>विपक्ष लगातार SIR की प्रक्रिया, मतदाताओं के नाम हटने और Form-6 में हुए बदलाव को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा है। अब पूर्व चुनाव आयुक्त का बयान आने के बाद आयोग पर अपनी प्रक्रिया और उसके मापदंडों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने का दबाव बढ़ सकता है।</h6>
<h2>Why The Statement Matters</h2>
<h6>अशोक लवासा पहले चुनाव आयोग के भीतर काम कर चुके हैं। इसलिए SIR की प्रक्रिया, पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर उनके सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।</h6>
<h6>हालांकि, उनके विचार व्यक्तिगत हैं और चुनाव आयोग का पक्ष इससे अलग हो सकता है। ऐसे में अब नजर इस बात पर रहेगी कि आयोग लवासा के सवालों का कोई जवाब देता है या अपनी पिछली सफाई पर कायम रहता है।</h6>
<h1><strong>SIR पर विपक्ष के आरोपों के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के सवालों ने विवाद को नया मोड़ दे दिया है। अब मामला केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनाव आयोग की पारदर्शिता, उसकी कार्यप्रणाली और मतदाताओं के अधिकारों पर आकर टिक गया है।</strong></h1>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Sep 2026 15:11:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>SIR पर 14 आपत्तियों के दावे के बाद EC की 8-Point सफाई—‘अलग राय सामान्य, सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से’</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव आयोग ने SIR पर कथित मतभेद की रिपोर्ट को अधूरी तस्वीर बताते हुए आठ बिंदुओं में सफाई दी है। आयोग के मुताबिक आंतरिक सवाल और सुझाव सामान्य प्रक्रिया हैं, जबकि सभी आधिकारिक फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी मिली है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/election-commission-eight-point-clarification-sir-internal-dissent-gyanesh-kumar/article-2172"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/election-commission-eight-point-clarification-sir-row.jpg.png" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>SIR पर 14 आपत्तियों के दावे के बाद EC की 8-Point सफाई—‘अलग राय सामान्य, सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से’</strong></h1>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/election-commission-eight-point-clarification-sir-row.jpg.png" alt="election-commission-eight-point-clarification-sir-row.jpg" width="1366" height="768"></img>
SIR पर कथित मतभेद की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने आठ बिंदुओं में अपनी कार्यप्रणाली और फैसलों पर सफाई जारी की।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 23 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>कथित अंदरूनी मतभेद पर चुनाव आयोग की विस्तृत सफाई</strong></li>
<li><strong>आठ बिंदुओं में बताई आयोग की निर्णय प्रक्रिया</strong></li>
<li><strong>कहा—सुझाव और अलग-अलग राय सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा</strong></li>
<li><strong>SIR सहित सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लेने का दावा</strong></li>
</ul>
<h6>यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद की रिपोर्ट पर आयोग ने विस्तृत जवाब जारी किया है। चुनाव आयोग ने आठ बिंदुओं में अपनी कार्यप्रणाली स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी अंतिम निर्णय से पहले अलग-अलग राय, सवाल और सुझाव सामने आना सामान्य प्रक्रिया है।</h6>
<h6>आयोग ने दावा किया कि SIR सहित पिछले एक साल के सभी आधिकारिक फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू एवं विवेक जोशी की सहमति से लिए गए हैं।</h6>
<h3>14 बार आपत्ति दर्ज होने का दावा</h3>
<h6>इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के विभिन्न कदमों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी।</h6>
<h6>रिपोर्ट में मतदाता सूची से नाम हटाने एवं जोड़ने, Form 6 में बदलाव, मतदाता डाटा के नियंत्रण और SIR के दौरान लिए गए कुछ फैसलों पर सवाल उठने का दावा किया गया। रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए।</h6>
<h6>अब चुनाव आयोग ने आठ बिंदुओं में इन सवालों का जवाब दिया है।</h6>
<h3>1. संवैधानिक नियमों के तहत काम करता है आयोग</h3>
<h6>चुनाव आयोग ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324, संबंधित कानूनों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत काम करने वाली बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है।</h6>
<h6>आयोग में लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच की व्यवस्था सामान्य रूप से चलती रहती है। इसका उद्देश्य कानूनी नियमों का पालन, पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया की मजबूती सुनिश्चित करना है।</h6>
<h3>2. सभी आधिकारिक फैसले कानूनी रूप से मान्य</h3>
<h6>आयोग के अनुसार, उसके सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश कानूनी रूप से मान्य हैं। इन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 के तहत तय प्रक्रिया का पालन करते हुए जारी किया गया है।</h6>
<h6>आयोग ने उन आरोपों को खारिज किया जिनमें बिना आवश्यक मंजूरी के आधिकारिक फैसले जारी किए जाने की बात कही गई थी।</h6>
<h3>3. शुरुआती सवाल अंतिम असहमति नहीं</h3>
<h6>चुनाव आयोग ने कहा कि किसी फैसले के शुरुआती Draft पर आयुक्तों द्वारा सवाल उठाना या सुझाव देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।</h6>
<h6>आयोग के मुताबिक इन सवालों और सुझावों का उद्देश्य मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना और चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाना होता है। शुरुआती टिप्पणी को अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति नहीं माना जा सकता।</h6>
<h3>4. अलग-अलग विचार होना सामान्य</h3>
<h6>आयोग ने कहा कि किसी भी बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार सामने आना सामान्य बात है। अंतिम फैसला लेने से पहले होने वाली चर्चा निर्णय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।</h6>
<h6>केवल तीनों चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देने के लिए अधिकृत है।</h6>
<h3>5. केवल 14 टिप्पणियों से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती</h3>
<h6>चुनाव आयोग ने कहा कि 10 महीनों में सामने आए कुछ चुनिंदा आंतरिक Notes और टिप्पणियों को दिखाकर बाकी फैसलों एवं मंजूरियों को नजरअंदाज करना पूरी तस्वीर पेश नहीं करता।</h6>
<h6>आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में करीब 40 नई पहल शुरू की गई हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण, SIR और दूसरे चुनाव सुधारों से जुड़े सभी अंतिम फैसले आयोग ने सर्वसम्मति से लिए हैं।</h6>
<h3>6. छह राज्यों में चुनाव कराने का दिया उदाहरण</h3>
<h6>आयोग ने बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव सफलतापूर्वक कराने का भी उल्लेख किया।</h6>
<h6>चुनाव आयोग ने कहा कि इतने बड़े स्तर पर चुनाव कराने के लिए व्यापक प्रशासनिक व्यवस्था, लगातार निगरानी और आयोग की कई मंजूरियों की जरूरत होती है। ये सभी काम पूरी चुनावी मशीनरी के तालमेल से किए गए।</h6>
<h3>7. ECINet की सुरक्षा पर दिया जवाब</h3>
<h6>आयोग ने अपने Digital Platform ECINet की सुरक्षा पर भी सफाई दी। आयोग के अनुसार, यह सिस्टम बिना अनुमति किसी बदलाव या छेड़छाड़ को रोकने वाले कड़े Data Security Protocol के तहत काम करता है।</h6>
<h6>IT Security Check और Audit Control राष्ट्रीय डाटाबेस पर लागू किए गए मानक Cyber Security उपायों का हिस्सा हैं। मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने की कानूनी शक्ति Electoral Registration Officer और District Election Officer जैसे अधिकृत अधिकारियों के पास रहती है।</h6>
<h3>8. संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने का भरोसा</h3>
<h6>चुनाव आयोग ने आखिरी बिंदु में कहा कि वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।</h6>
<h6>आयोग ने कहा कि वह लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका और जिम्मेदारी को समझता है। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता एवं मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने के लिए काम जारी रहेगा।</h6>
<h3>विपक्ष अभी भी मांग रहा पूरे दस्तावेज</h3>
<h6>चुनाव आयोग की सफाई के बावजूद विवाद समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा है। विपक्षी नेताओं की मांग है कि आयोग केवल अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति वाला न बताए, बल्कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा कथित रूप से उठाए गए सवालों और उन पर हुई कार्रवाई की जानकारी भी सार्वजनिक करे।</h6>
<h6>दूसरी ओर आयोग का कहना है कि आंतरिक चर्चा को टकराव के रूप में दिखाना गलत है। उसके मुताबिक सवाल और सुझाव मिलने के बाद ही अंतिम फैसला सर्वसम्मति से लिया गया।</h6>
<h6><strong>चुनाव आयोग ने आठ बिंदुओं में अपनी कार्यप्रणाली और फैसलों का बचाव जरूर किया है, लेकिन कथित 14 आपत्तियों से जुड़े दस्तावेज अब भी पूरे विवाद के केंद्र में हैं। आयोग इन्हें सामान्य आंतरिक चर्चा बता रहा है, जबकि विपक्ष इन्हें गंभीर मतभेद मान रहा है। अब जनता की निगाह इस बात पर रहेगी कि आयोग इन आपत्तियों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करता है या राजनीतिक विवाद और तेज होता है।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/election-commission-eight-point-clarification-sir-internal-dissent-gyanesh-kumar/article-2172</link>
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                <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 19:07:21 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>‘राहुल गांधी ने बिल्कुल सही कहा’; चुनाव आयोग पर उमर अब्दुल्ला बोले—भरोसा उठ गया तो वोट कौन देगा?</title>
                                    <description><![CDATA[उमर अब्दुल्ला ने कहा कि किसी योग्य नागरिक को मतदान से रोकना लोकतंत्र पर हमला है। चुनाव प्रक्रिया से लोगों का भरोसा उठ गया तो वे मतदान में हिस्सा क्यों लेंगे? चुनाव आयोग ने मतभेद के दावों को खारिज किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/omar-abdullah-supports-rahul-gandhi-election-commission-sir-row/article-2171"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/omar-abdullah-rahul-gandhi-election-commission-sir-row.jpg2.jpg" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>‘राहुल गांधी ने बिल्कुल सही कहा’; चुनाव आयोग पर उमर अब्दुल्ला बोले—भरोसा उठ गया तो वोट कौन देगा?</strong></h1>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/omar-abdullah-rahul-gandhi-election-commission-sir-row.jpg2.jpg" alt="omar-abdullah-rahul-gandhi-election-commission-sir-row.jpg2" width="1366" height="768"></img>
चुनाव आयोग और SIR विवाद पर राहुल गांधी के बयान का समर्थन करते जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 23 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>चुनाव आयोग के कामकाज पर उमर अब्दुल्ला ने उठाए सवाल</strong></li>
<li><strong>राहुल गांधी के बयान को बताया बिल्कुल सही</strong></li>
<li><strong>बोले—चुनाव से भरोसा उठा तो लोकतंत्र में क्या बचेगा</strong></li>
<li><strong>चुनाव आयोग ने कहा—SIR के सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए</strong></li>
</ul>
<h6>चुनाव आयोग और Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर जारी विवाद में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी उतर गए हैं। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि मतदान के अधिकार से किसी नागरिक को रोकना लोकतंत्र पर सीधा हमला है।</h6>
<h6>उमर अब्दुल्ला ने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद चुनाव होते हैं। यदि लोगों का भरोसा चुनाव प्रक्रिया से ही उठ गया तो वे चुनाव में हिस्सा क्यों लेंगे? उन्होंने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से इस विवाद पर गंभीरता से विचार करने और सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की।</h6>
<h3>‘राहुल गांधी ने बिल्कुल सही कहा’</h3>
<h6>राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा, “अगर आप किसी को वोट देने से रोक रहे हैं, जबकि वोट देना उसका अधिकार है, तो यह लोकतंत्र पर हमला नहीं है तो और क्या है? राहुल गांधी ने जो कहा, बिल्कुल सही कहा है।”</h6>
<h6>उन्होंने आगे कहा कि अब यह देखना होगा कि सामने आए सवालों और आरोपों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। केवल सफाई जारी करने से लोगों के मन में पैदा हुई आशंकाएं खत्म नहीं होंगी। चुनावी व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी है।</h6>
<h3>चुनाव आयोग की सफाई पर भी उठाए सवाल</h3>
<h6>उमर अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद से जुड़ी रिपोर्ट कई गंभीर सवाल खड़े करती है। उनके अनुसार, आयोग की ओर से यह कहना कि आंतरिक चर्चा में अलग-अलग विचार सामने आते रहते हैं, बताता है कि पूरे मामले पर अधिक स्पष्ट जानकारी देने की जरूरत है।</h6>
<h6>उन्होंने कहा कि आयोग को आरोपों का विस्तार से जवाब देना चाहिए, जिससे मतदाताओं के बीच कोई भ्रम न रहे। चुनाव की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।</h6>
<h3>जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का किया जिक्र</h3>
<h6>उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में हुई परिसीमन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर में SIR का विवाद राष्ट्रीय स्तर पर सामने आने से पहले ही चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर शिकायतें मिल रही थीं।</h6>
<h6>उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और उसमें कई कमियां थीं। उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि निर्वाचन क्षेत्रों में किए गए बदलावों से एक राजनीतिक दल और उसके सहयोगियों को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया गया।</h6>
<h6>यह उमर अब्दुल्ला का आरोप है। चुनाव आयोग पहले भी परिसीमन और चुनावी प्रक्रिया को नियमों के अनुसार एवं निष्पक्ष तरीके से पूरा किए जाने की बात कहता रहा है।</h6>
<h3>राहुल गांधी ने क्या आरोप लगाया?</h3>
<h6>कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के दो आयुक्तों द्वारा कथित रूप से कई बार आपत्ति दर्ज कराने की रिपोर्ट सामने आने के बाद आयोग पर तीखा हमला किया था।</h6>
<h6>राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाना या योग्य नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करना संविधान पर हमला है। उन्होंने चुनाव आयोग के अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि गलत काम करने वालों की भविष्य में जवाबदेही तय की जाएगी।</h6>
<h3>चुनाव आयोग ने क्या कहा?</h3>
<h6>चुनाव आयोग ने अंदरूनी मतभेद और फैसलों में टकराव के दावों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि SIR सहित सभी अंतिम फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए।</h6>
<h6>आयोग ने कहा कि किसी निर्णय से पहले सवाल, सुझाव और अलग विचार सामने आना सामान्य प्रक्रिया है। इन्हें अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति नहीं माना जा सकता। आयोग के अनुसार, उसके सभी आधिकारिक फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।</h6>
<h3>चुनावी भरोसे पर छिड़ी बड़ी बहस</h3>
<h6>राहुल गांधी के आरोपों को उमर अब्दुल्ला का समर्थन मिलने के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है। विपक्ष आयोग से कथित आपत्तियों और SIR से जुड़े फैसलों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग कर रहा है।</h6>
<h6><strong>उमर अब्दुल्ला का बयान इस विवाद को नया राजनीतिक मोड़ देता है। उनका सीधा सवाल है कि यदि जनता का चुनाव प्रक्रिया से भरोसा उठ गया तो लोकतंत्र की बुनियाद कैसे बचेगी। अब चुनाव आयोग के सामने केवल आरोपों को खारिज करने की नहीं, बल्कि मतदाताओं का भरोसा मजबूत करने की भी बड़ी चुनौती है।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 18:42:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>‘14 बार असहमति तानाशाही नहीं, चेक-बैलेंस है’; राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ आरोप पर संबित पात्रा का पलटवार</title>
                                    <description><![CDATA[संबित पात्रा ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच सवाल और असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे तानाशाही या वोट चोरी का प्रमाण बताना गलत है। राहुल गांधी ने इस मामले को संविधान पर हमला और देशद्रोह बताया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/sambit-patra-reply-rahul-gandhi-vote-chori-election-commission-sir-row/article-2169"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/sambit-patra-rahul-gandhi-vote-chori-eci-sir-row.jpg2.jpg" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>14 बार असहमति तानाशाही नहीं, चेक-बैलेंस है’; राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ आरोप पर संबित पात्रा का पलटवार </strong></h1>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/sambit-patra-rahul-gandhi-vote-chori-eci-sir-row.jpg2.jpg" alt="sambit-patra-rahul-gandhi-vote-chori-eci-sir-row.jpg2" width="1366" height="768"></img>
चुनाव आयोग और SIR विवाद पर राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते BJP सांसद संबित पात्रा।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 23 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद पर बढ़ा राजनीतिक विवाद</strong></li>
<li><strong>राहुल गांधी ने BJP और चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप</strong></li>
<li><strong>संबित पात्रा बोले—असहमति लोकतांत्रिक चेक-बैलेंस का हिस्सा</strong></li>
<li><strong>चुनाव आयोग ने कहा—SIR सहित सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए</strong></li>
</ul>
<p>चुनाव आयोग और Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर जारी विवाद में BJP नेता संबित पात्रा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर पलटवार किया है। पात्रा ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच सवाल, सुझाव या किसी मुद्दे पर असहमति होना लोकतांत्रिक व्यवस्था में चर्चा और आंतरिक चेक-बैलेंस की निशानी है। इसे तानाशाही या चुनाव आयोग की विफलता बताना गलत है।</p>
<p>संबित पात्रा का यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी।</p>
<h3>राहुल गांधी ने लगाया ‘वोट चोरी’ का आरोप</h3>
<p>इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग, BJP और RSS पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने कहा कि कथित ‘वोट चोरी’ देश के नागरिकों और संविधान पर सीधा हमला है।</p>
<p>उन्होंने आरोप लगाया कि यदि चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्त लगातार फैसलों पर सवाल उठा रहे थे, तो यह मामला बेहद गंभीर है। राहुल गांधी ने इसे देशद्रोह तक बताते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई।</p>
<p>हालांकि, ये सभी आरोप राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से लगाए गए हैं। चुनाव आयोग और BJP ने इन्हें खारिज करते हुए आयोग की चुनावी प्रक्रिया का बचाव किया है।</p>
<h3>संबित पात्रा ने कांग्रेस को घेरा</h3>
<h6>राहुल गांधी के बयान पर जवाब देते हुए संबित पात्रा ने कहा कि विपक्षी दल चुनाव में हार मिलने के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करने लगते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद लगातार कमजोर हो रहे विपक्ष ने अब चुनाव आयोग को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।</h6>
<h6>पात्रा ने कहा कि किसी संस्था के भीतर अधिकारियों द्वारा सवाल उठाना या सुझाव देना सामान्य प्रक्रिया है। तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर चर्चा या अलग राय को तानाशाही बताना गलत है। उनके अनुसार, आंतरिक बातचीत और मतभेद संस्थागत चेक-बैलेंस का प्रमाण हैं।</h6>
<h3>चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?</h3>
<h6>मामला बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। आयोग ने कहा कि SIR सहित उसके सभी अंतिम फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।</h6>
<h6>आयोग के अनुसार, चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए अधिकारियों और आयुक्तों द्वारा सवाल एवं सुझाव दिए जाना सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा है। किसी फैसले से पहले हुई चर्चा को औपचारिक असहमति या अंतिम निर्णय का विरोध नहीं माना जाना चाहिए।</h6>
<h6>आयोग ने यह भी कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश और प्रशासनिक निर्देश तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार जारी किए गए हैं। आयोग ने अपने कामकाज और अंतिम फैसलों में मतभेद होने के दावों को खारिज किया है।</h6>
<h3>14 आपत्तियों के दावे पर विवाद</h3>
<h6>रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, Form 6 में बदलाव तथा चुनावी डाटा को नियंत्रित करने जैसे मामलों पर सवाल उठाए थे।</h6>
<h6>इसी दावे को आधार बनाकर विपक्ष चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब और अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहा है। कांग्रेस का कहना है कि आयोग को केवल अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति वाला बताने के बजाय आयुक्तों द्वारा उठाए गए हर सवाल का जवाब देना चाहिए।</h6>
<h6>दूसरी तरफ BJP का तर्क है कि किसी फैसले से पहले अधिकारियों द्वारा सवाल उठाना संवैधानिक संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली है और इसे चुनाव में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।</h6>
<h3>अब पारदर्शिता पर टिका पूरा विवाद</h3>
<h6>SIR और मतदाता सूची को लेकर पहले से जारी राजनीतिक विवाद के बीच चुनाव आयोग के अंदर कथित आपत्तियों की रिपोर्ट ने मामले को और गरमा दिया है। विपक्ष इसे आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल बता रहा है, जबकि BJP इसे सामान्य चर्चा को राजनीतिक विवाद बनाने का प्रयास कह रही है।</h6>
<p><strong>राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों के बाद विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। चुनाव आयोग की सफाई और संबित पात्रा के पलटवार के बावजूद विपक्ष 14 कथित लिखित आपत्तियों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग कर रहा है। अब देश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग इन सवालों पर कोई विस्तृत दस्तावेज जारी करता है या विवाद और तेज होता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/sambit-patra-reply-rahul-gandhi-vote-chori-election-commission-sir-row/article-2169</link>
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                <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 17:16:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘EC को हाईजैक कर लोकतंत्र पर चलाया बुलडोजर’, सिंघवी का ज्ञानेश कुमार पर हमला; दिल्ली-हरियाणा चुनाव रद्द करने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[SIR विवाद पर अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को हाईजैक करके दूसरे आयुक्तों को फैसलों से दूर रखा गया। उन्होंने विवादित आदेश रद्द करने और दिल्ली-हरियाणा के चुनाव दोबारा कराने की मांग उठाई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/abhishek-manu-singhvi-gyanesh-kumar-sir-ec-row/article-2166"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/abhishek-manu-singhvi-gyanesh-kumar-sir-ec-row.jpg2.jpg" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>‘EC को हाईजैक कर लोकतंत्र पर चलाया बुलडोजर’, सिंघवी का ज्ञानेश कुमार पर हमला; दिल्ली-हरियाणा चुनाव रद्द करने की मांग</strong></h1>
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SIR विवाद पर कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | राष्ट्रीय डेस्क | 23 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग को हाईजैक करने का आरोप</strong></li>
<li><strong>दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों का दावा</strong></li>
<li><strong>दिल्ली और हरियाणा के चुनाव रद्द करने की मांग</strong></li>
<li><strong>EC ने कहा—सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए</strong></li>
</ul>
<h6>यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर विपक्ष के हमले लगातार तेज होते जा रहे हैं। कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव आयोग को कथित रूप से हाईजैक करके चलाया गया।</h6>
<h6>सिंघवी ने दावा किया कि आयोग के दो सदस्यों की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए कई फैसले लिए गए। उन्होंने इसे चुनाव आयोग के अंदर चलाया गया ‘आंतरिक बुलडोजर’ बताया और कहा कि इससे संस्था की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।</h6>
<h3>10 महीनों में 14 आपत्तियों का दावा</h3>
<h6>यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद बढ़ा है, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में आयोग के अलग-अलग फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति जताई थी।</h6>
<h6>इन आपत्तियों को नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने तथा Voter Database के नियंत्रण जैसे मामलों से जुड़ा बताया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कुछ आदेश दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना जारी किए गए।</h6>
<h3>‘चुनाव आयोग को हाईजैक किया गया’</h3>
<h6>अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने ही साथी चुनाव आयुक्तों को फैसलों से दूर रखकर आयोग की व्यवस्था पर नियंत्रण कर लिया। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर मामला बताया।</h6>
<h6>सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और इसके फैसले किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं होने चाहिए। आयोग के सदस्यों की राय और असहमति को आधिकारिक रिकॉर्ड में जगह मिलनी चाहिए।</h6>
<h3>दिल्ली-हरियाणा चुनाव पर उठाए सवाल</h3>
<h6>सिंघवी ने SIR और मतदाता सूची में बदलावों का मुद्दा उठाते हुए दिल्ली और हरियाणा के विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने मांग की कि इन चुनावों से जुड़े रिकॉर्ड और मतदाता सूचियों की स्वतंत्र जांच कराई जाए।</h6>
<h6>उन्होंने दिल्ली और हरियाणा के चुनाव रद्द करके दोबारा मतदान कराने की मांग भी उठाई। हालांकि चुनाव में गड़बड़ी और परिणाम प्रभावित होने के उनके आरोपों की किसी अदालत या आधिकारिक जांच में पुष्टि नहीं हुई है।</h6>
<h3>13 करोड़ नाम हटाने का दावा</h3>
<h6>कांग्रेस नेता ने दावा किया कि SIR प्रक्रिया के दौरान देशभर की मतदाता सूचियों से करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने पर पूरी प्रक्रिया की जांच और सार्वजनिक जवाब जरूरी है।</h6>
<h6>मतदाता सूची से नाम हटाने की वास्तविक संख्या और उसके कारण अलग-अलग राज्यों में अलग हैं। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित और Duplicate मतदाताओं की पहचान के लिए पुनरीक्षण किया जाता है। पात्र मतदाताओं को दस्तावेज देकर अपना नाम जुड़वाने का अवसर भी मिलता है।</h6>
<h3>चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?</h3>
<h6>चुनाव आयोग ने अंदरूनी मतभेद और एकतरफा फैसलों के आरोपों को नकारा है। आयोग का कहना है कि अधिकारियों और चुनाव आयुक्तों को सुझाव तथा अपनी राय देने की पूरी स्वतंत्रता है।</h6>
<h6>आयोग के अनुसार, किसी विषय पर अलग-अलग सुझाव आना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन SIR सहित सभी अंतिम फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने कहा कि किसी सदस्य ने अंतिम फैसलों के खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई।</h6>
<h3>आरोप बड़े, अब प्रमाण और जांच पर टिकी निगाहें</h3>
<p><strong>अभिषेक मनु सिंघवी के आरोपों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में हुए बदलावों पर नई बहस शुरू कर दी है। चुनाव आयोग ने सभी फैसलों को सर्वसम्मति से लिया हुआ बताया है, जबकि कांग्रेस स्वतंत्र जांच की मांग कर रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कथित लिखित आपत्तियों और चुनाव परिणामों के बीच कोई संबंध साबित होगा या मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाएगा।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/abhishek-manu-singhvi-gyanesh-kumar-sir-ec-row/article-2166</link>
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                <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 15:25:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘BJP के लिए चुनाव चुराए’, ज्ञानेश कुमार पर केजरीवाल का बड़ा आरोप; सात राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[अरविंद केजरीवाल ने SIR प्रक्रिया को गैरकानूनी बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर BJP को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया है। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए सभी फैसले सर्वसम्मति से होने की बात कही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/kejriwal-gyanesh-kumar-sir-row-demands-fresh-elections/article-2165"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/arvind-kejriwal-gyanesh-kumar-sir-election-allegations.jpg.jpg" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>‘BJP के लिए चुनाव चुराए’, ज्ञानेश कुमार पर केजरीवाल का बड़ा आरोप; सात राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग</strong></h1>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/arvind-kejriwal-gyanesh-kumar-sir-election-allegations.jpg.jpg" alt="arvind-kejriwal-gyanesh-kumar-sir-election-allegations.jpg" width="1366" height="768"></img>
SIR विवाद के बीच अरविंद केजरीवाल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दोबारा चुनाव की मांग की।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>ज्ञानेश कुमार पर केजरीवाल का बड़ा आरोप</strong></li>
<li><strong>मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी की मांग</strong></li>
<li><strong>कई राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की अपील</strong></li>
<li><strong>चुनाव आयोग ने कहा—सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए</strong></li>
</ul>
<h6>मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर जारी विवाद अब और तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उनकी गिरफ्तारी की मांग की है।</h6>
<h6>केजरीवाल ने दावा किया कि चुनाव आयोग के फैसलों और SIR प्रक्रिया का इस्तेमाल BJP को चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए किया गया। उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करके दोबारा मतदान कराने की मांग भी उठाई।</h6>
<h3>सात राज्यों के चुनाव दोबारा कराने की मांग</h3>
<h6>अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित हाल के वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इन राज्यों के चुनाव रद्द करके दोबारा निष्पक्ष मतदान कराया जाना चाहिए।</h6>
<h6>उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के कुछ आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की औपचारिक सहमति के बिना जारी किए गए। केजरीवाल के मुताबिक, अगर ऐसे फैसले आयोग की बैठक और मंजूरी के बिना लिए गए हैं तो उनसे जुड़े आदेशों को रद्द किया जाना चाहिए।</h6>
<h3>ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग</h3>
<h6>केजरीवाल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भ्रष्ट बताते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि मामले की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए और आरोप सही पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।</h6>
<h6>AAP संयोजक ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया को एक स्थान से नियंत्रित किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।</h6>
<h3>पुरानी Voter List बहाल करने की मांग</h3>
<h6>केजरीवाल ने SIR प्रक्रिया को रद्द करने और करीब तीन वर्ष पुरानी मतदाता सूची बहाल करने की मांग की। उनका दावा है कि मौजूदा प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए और इससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए हैं।</h6>
<h6>उन्होंने यह भी कहा कि नए मतदाता जोड़ने या किसी मतदाता का नाम हटाने का अधिकार संबंधित Electoral Registration Officer के पास होता है। इस प्रक्रिया में किसी तरह का केंद्रीय नियंत्रण कानून के खिलाफ हो सकता है।</h6>
<h3>चुनाव आयोग ने आरोपों पर क्या कहा?</h3>
<h6>चुनाव आयोग के सूत्रों ने मतभेद और बिना मंजूरी फैसले लिए जाने के दावों को नकारा है। आयोग का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन SIR सहित सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति और तीनों सदस्यों की मंजूरी से लिए गए।</h6>
<h6>आयोग के अनुसार, बैठकों में अधिकारियों और आयुक्तों द्वारा सवाल या सुझाव देना सामान्य प्रक्रिया है। इसे अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति नहीं माना जा सकता।</h6>
<h3>अब आरोपों की सच्चाई तय करेगी अगली सियासी लड़ाई</h3>
<h6><strong>केजरीवाल के आरोप बेहद गंभीर हैं, लेकिन अभी तक किसी अदालत या आधिकारिक जांच में चुनाव चोरी का दावा साबित नहीं हुआ है। चुनाव आयोग ने सभी फैसले सर्वसम्मति से होने की बात कही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण पेश करेगा या यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा।</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/kejriwal-gyanesh-kumar-sir-row-demands-fresh-elections/article-2165</link>
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                <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 14:59:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pratyakshdarshi Samachar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चुनाव आयोग में 14 आपत्तियों का दावा; राहुल गांधी का बड़ा हमला, बोले- वोट चोरी राजद्रोह है</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर मतभेद की रिपोर्ट ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी ने कहा कि वोट चोरी सिर्फ चुनावी गड़बड़ी नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र के साथ राजद्रोह है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/national/rahul-gandhi-election-commission-sir-14-objections/article-2161"><img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/400/2026-09/rahul-gandhi-sir-election-commission-14-objections.webp2.jpg" alt=""></a><br /><h1 class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>हमला, बोले- वोट चोरी राजद्रोह है</strong></h1>
<h5><strong>चुनाव आयोग के भीतर SIR को लेकर मतभेद होने की रिपोर्ट सामने आने के बाद राहुल गांधी ने आयोग पर हमला बोला है।</strong></h5>
<img src="https://www.pratyakshdarshisamachar.com/media/2026-09/rahul-gandhi-sir-election-commission-14-objections.webp2.jpg" alt="rahul-gandhi-sir-election-commission-14-objections.webp2" width="1366" height="768"></img>
SIR पर चुनाव आयोग में मतभेद की रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी ने आयोग पर निशाना साधा।

<p><strong>प्रत्यक्षदर्शी समाचार | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026</strong></p>
<h1><strong>खबर में खास</strong></h1>
<ul>
<li><strong>दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार आपत्ति जताई: रिपोर्ट</strong></li>
<li><strong>फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची पर उठाए गए सवाल</strong></li>
<li><strong>राहुल गांधी बोले- वोट चोरी राजद्रोह है</strong></li>
<li><strong>विपक्ष ने कथित आपत्तियां सार्वजनिक करने की मांग उठाई</strong></li>
<li><strong>चुनाव आयोग ने कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए</strong></li>
</ul>
<h6>चुनाव आयोग के भीतर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर मतभेद होने की रिपोर्ट ने देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के अलग-अलग फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की।</h6>
<h6>ये कथित आपत्तियां मतदाता सूची से नाम हटाने, नए मतदाताओं के पंजीकरण, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डाटाबेस के संचालन जैसे महत्वपूर्ण मामलों से जुड़ी बताई गई हैं।</h6>
<h6>रिपोर्ट सामने आने के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि वोट चोरी केवल चुनावी गड़बड़ी नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ राजद्रोह है।</h6>
<h2>राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को घेरा</h2>
<h6>राहुल गांधी लंबे समय से मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। ताजा रिपोर्ट सामने आने के बाद उन्होंने अपने पुराने आरोपों को दोहराते हुए कहा कि देश के नागरिकों का मतदान अधिकार प्रभावित करना बेहद गंभीर मामला है।</h6>
<h6>राहुल गांधी का आरोप है कि SIR के नाम पर पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग उनके वोट चोरी के आरोपों को पहले भी खारिज कर चुका है और प्रमाणित सबूत पेश करने की मांग करता रहा है।</h6>
<h6>इसलिए राहुल गांधी का बयान एक राजनीतिक आरोप है। चुनाव आयोग ने वोट चोरी या किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने के आरोप को स्वीकार नहीं किया है।</h6>
<h2>आखिर क्या है 14 आपत्तियों का मामला?</h2>
<h6>इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के फैसलों पर 10 महीने में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की।</h6>
<h6>रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि आयोग के नाम से कुछ निर्देश उनकी जानकारी और मंजूरी के बिना कैसे जारी हुए।</h6>
<h6>आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और शामिल करने की प्रक्रिया तथा चुनावी डाटाबेस तक अधिकारियों की पहुंच जैसे मामले शामिल बताए गए हैं।</h6>
<h2>फॉर्म-6 में बदलाव पर क्यों उठे सवाल?</h2>
<h6>फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस फॉर्म में SIR से जुड़ा एक नया सवाल शामिल कर दिया गया था।</h6>
<h6>आवेदकों से पूछा गया कि उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद है या नहीं।</h6>
<h6>दावा है कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस बदलाव पर पहले ही सवाल उठाए थे। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी कथित तौर पर इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए हटाने की मांग की।</h6>
<h2>मतदाता डाटाबेस के नियंत्रण पर भी आपत्ति</h2>
<h6>रिपोर्ट में मतदाता सूची के डिजिटल डाटाबेस के कथित केंद्रीकरण पर भी चिंता जताने का दावा किया गया है।</h6>
<h6>सामान्य रूप से विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की निगरानी में तैयार और अपडेट की जाती है। कथित आपत्ति में कहा गया कि स्थानीय और राज्य स्तरीय अधिकारियों को डाटाबेस तक पूरी पहुंच मिलनी चाहिए।</h6>
<h6>सवाल यह उठाया गया कि यदि डाटाबेस का नियंत्रण केंद्रीय स्तर पर सीमित हो जाएगा, तो स्थानीय अधिकारियों की कानूनी भूमिका और जवाबदेही कैसे बनी रहेगी।</h6>
<h2>चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?</h2>
<h6>चुनाव आयोग के सूत्रों ने औपचारिक मतभेद के दावे से इनकार किया है। सूत्रों का कहना है कि SIR समेत आयोग के सभी महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए।</h6>
<h6>आयोग के मुताबिक, बैठक के दौरान सवाल पूछना, टिप्पणी करना या सुझाव देना सामान्य प्रक्रिया है। इसे अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति नहीं माना जा सकता।</h6>
<h6>सूत्रों ने दावा किया कि चर्चा के बाद आयोग के सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और उन पर तीनों सदस्यों की मंजूरी थी।</h6>
<h2>विपक्ष ने उठाई दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग</h2>
<h6>कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की सफाई के बाद कथित लिखित आपत्तियों को सार्वजनिक करने की मांग उठाई है।</h6>
<h6>विपक्ष का कहना है कि यदि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, तो आयोग को इससे जुड़े दस्तावेज और बैठकों का आधिकारिक रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए।</h6>
<h6>वहीं, आयोग का पक्ष है कि आंतरिक चर्चा में अलग-अलग सुझाव आना सामान्य बात है और इससे यह साबित नहीं होता कि अंतिम फैसलों पर सदस्यों के बीच मतभेद था।</h6>
<h2>अब सबसे बड़ा सवाल- आपत्ति या सामान्य सुझाव?</h2>
<h6>फिलहाल इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई बातें औपचारिक आपत्तियां थीं या फैसला लेने से पहले दिए गए सामान्य सुझाव।</h6>
<h6>एक तरफ रिपोर्ट में 14 लिखित आपत्तियों और कुछ फैसलों को अनधिकृत बताए जाने का दावा किया गया है। दूसरी तरफ आयोग के सूत्र सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कह रहे हैं।</h6>
<h6>अब स्थिति तभी पूरी तरह साफ हो सकेगी, जब चुनाव आयोग कथित आपत्तियों और उनसे जुड़े फैसलों का आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करेगा।</h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 13:18:06 +0530</pubDate>
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